Jan 28, 2015

मुखौटा

मेरी ये दो आँखे अक्सर मुझे झुठला सी जाती है 

एक आँख पिरोती आंसू , तो एक हसी ठिठोली कर जाती है 

कल तूने जिसे देखा था वो भी मैं ही थी बस पहनावा बदल गया था,

एक चेहरा उतार कर फेका ही था, की दूजा आकर चिपक गया था 

रेखाएं अब चेहरे पर, मैं घडी-घडी बदलती हू ,

रंगमंच तो देखा नहीं पर अभिनय खूब मैं करती हू,

अभिनय  करते-करते भूल गयी हू  अपनी पहचान ,

रिक्त पड़ा है जीवन सारा, न  आत्मा है और न है प्राण,

एक देह बची है केवल, जिसपे रोज़ बदलते वस्त्र है,

झूठ पिरोया व्यक्तित्व , सच्चाई का शस्त्र है,

रणभूमी में खड़ी  अकेली, फिर भी अकेलेपन से डरती हू 

और जग में जीवित रहने के लिए, मैं रोज़ अंतर्मन में मरती हू………

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