Apr 10, 2014

मित्र

कोई वो ऐसा था कि मैं , बस मैं ही थी उसके सामने,

उस रिश्ते  को न बाँधा था रूप ने, और न ही नाम ने,

सोच कर कहना, या कह कर सोचना जरूरत नहीं थी उस साथ की,

न आँखों से आँखे मिली कभी, न जुडी कभी कड़ी हाथो से हाथ की,

कोई लेन देन नहीं थी , शायद वो एक ही रिश्ता व्यपार नहीं था,

उसके साथ भावनाओ का कभी लगता कोई बाज़ार नहीं था,

कोई कसम नहीं, वचन नहीं, सिर्फ स्नेह ही रिश्ते  का आधार था,

न टीका - टिपड़ी , न सही गलत, न ही परम्पराओ का कोई प्रहार था,

न जनम से मिला, न बंधन  में  था बंधा , सिर्फ मन से मन का लगाव था,

उसकी वो मित्रता का बंधन , मेरे जीवन का एक सुनहरा पड़ाव था