Oct 29, 2011

चल अकेला


राह थी कठिन , खोज करने लगी मैं हमराह की,

धूप से भयभीत शरण खोजने लगी मैं छाह की,

जब-जब गिरी निहारती रही, एक हाथ अपनी ओर ,

भटकती हुयी तलाशती रही, पथ प्रदर्शक की छोर,

ठहर गयी मैं न चली, प्रतीक्षा करती हुयी एक साथ की,

ले आएगा सूरज कोई , इस विचार में गवाती रही नीद मैं हर रात की,

स्वपन से जगी हू अब , वास्तविकता ने दिखलाया है दर्पण,

स्वयं ह़ी तू है स्वयं की, मत मांग किसी और का समर्पण,

अकेले ह़ी पार करनी है राह, हमराह कही गुमराह न कर दे,

छाव की कामना कही, धूप से डर कर न चल दे,

पथ भी तेरा, प्रदर्शक भी तू ह़ी,

अभिनय भी तेरा दर्शक भी तू ह़ी,

लक्ष्य है तेरा , तो अवरोध से भी तुझे ह़ी लड़ना होगा,

और लालसा अगर रखती है स्वर्गलोक की, तो तुझे स्वयं ह़ी मरना होगा...