Jul 24, 2011

थोड़ा सा ज्ञान


मैंने अब ऐसा सोचा है , और सोचा तो शायद तूने भी होगा,

वो जो बीत गया अब लगता बेहतर, पर कल शायद ये आज भी बेहतर होगा,

जो हाथ नहीं वो ठहरा जाए, और जो हाथ में है वो लगा फिसलने,

न कहता न रहता था, जाने फिर वो किसकी लगा था सुनने,

मैं समझाती लाख मगर, चलने लगता वो अपने पैर,

गिरता था, फिर उठ जाता, मेरा साथ उसे अब लगता गैर,

कहता था मुझे नहीं चलूँगा मैं अब तेरे पीछे,

आँखों को हरदम मीचे- मीचे,

आँख खुली सदियों बाद ये मेरी, अब दिखती है मुझको मेरी राह,

चाहा जिसको समझ के अपना, नहीं थी कभी मेरी वो चाह,

दौड़ी मैं भागी फिर, पर दूरी शून्य ह़ी होती थी,

थक-थक के गिर जाती, पर आँख न मेरी सोती थी,

अब जाना उस मार्ग, जो तूने नहीं है दिखलाया,

अज्ञानी, मूरख, और कपटी लोगो ने है नाम धराया,

लोक भय अब नहीं रहा, चित्त भी मेरा है ये समझ गया,

मत भागो उसके पीछे जो सत्य से है दूर रहा,

सुन ले अब मन की हर बात, मष्तिस्क को तू विश्राम दे,

हे ईश्वर बस इतनी विनती अज्ञानी को थोडा सा ज्ञान दे.....

3 comments:

  1. हे ईश्वर बस इतनी विनती अज्ञानी को थोडा सा ज्ञान दे.....

    Great work Concluding line to Awesome hai.
    Yun hi Bas likti Raho.

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