Jul 24, 2011

थोड़ा सा ज्ञान


मैंने अब ऐसा सोचा है , और सोचा तो शायद तूने भी होगा,

वो जो बीत गया अब लगता बेहतर, पर कल शायद ये आज भी बेहतर होगा,

जो हाथ नहीं वो ठहरा जाए, और जो हाथ में है वो लगा फिसलने,

न कहता न रहता था, जाने फिर वो किसकी लगा था सुनने,

मैं समझाती लाख मगर, चलने लगता वो अपने पैर,

गिरता था, फिर उठ जाता, मेरा साथ उसे अब लगता गैर,

कहता था मुझे नहीं चलूँगा मैं अब तेरे पीछे,

आँखों को हरदम मीचे- मीचे,

आँख खुली सदियों बाद ये मेरी, अब दिखती है मुझको मेरी राह,

चाहा जिसको समझ के अपना, नहीं थी कभी मेरी वो चाह,

दौड़ी मैं भागी फिर, पर दूरी शून्य ह़ी होती थी,

थक-थक के गिर जाती, पर आँख न मेरी सोती थी,

अब जाना उस मार्ग, जो तूने नहीं है दिखलाया,

अज्ञानी, मूरख, और कपटी लोगो ने है नाम धराया,

लोक भय अब नहीं रहा, चित्त भी मेरा है ये समझ गया,

मत भागो उसके पीछे जो सत्य से है दूर रहा,

सुन ले अब मन की हर बात, मष्तिस्क को तू विश्राम दे,

हे ईश्वर बस इतनी विनती अज्ञानी को थोडा सा ज्ञान दे.....

Jul 8, 2011

GEC REWA's GIRLS HOSTEL


हर एक कमरा एक घर था , टीवी के जैसे different चैनल,

बिना बात की बातो में बनते discussion के कितने पैनल,

न टीवी न कंप्यूटर रेडियो भी पास नहीं था,

पर वक़्त गुजरता ऐसे की वक़्त का अहसास नहीं था,

जाने क्या बाते रहती थी, रात गुज़र जाती थी सारी,

और सुबह कॉलेज की कभी न होती टाइम पे तैयारी,

शपथ हर sem के पहले, इस बार लगा देंगे जी और जान,

पर exam के दस दिन पहले syllabus का करते थे ध्यान,

१२ बजे की birth day पार्टी सुबह ६ बजे तक चलती थी,

वार्डेन के आगे रोज़ किसी न किसी बात पे क्लास हमारी लगती थी,

फिर होता एक शपथ समारोह, जो शाम तक टूट जाता था,

और हमारी बदमाशी का बाँध हरदम छूट ह़ी जाता था,

पानी की होली और बिना कारन होती रोज़ दिवाली,

खाने की छीना छपटी में न जाने टूटी कितनी थाली,

जब मैंने वह कदम रखा था अकेली और अनजान थी,

नए नए से सारे चेहरे , किसी से न कोई पहचान थी,

पर वही था देखा असली रिश्ते बनते, जो साथ ह़ी रोते और साथ ह़ी हँसते,

वो अनजाने अजनबी, न जाने कब मेरे अपने हो गए,

कॉलेज का टेरिस और जागी सारी राते अब सब सपने से हो गए,

शान्ति भवन की विंग में रहती थी तीन वो तिकड़ी,

प्यारा जिसे शोर शराबा , मैं जूही और दीप्ती,

socialized society के हम थे कुछ unspecial और unsocial


चेहरे पे smile आज भी आये, जब याद करू engg का hostel