May 17, 2011

भोग की वस्तु



आज कुछ देख रही थी इंडिया का इतिहास

जहा स्त्री भोग की वस्तु से ज्यादा कुछ और नहीं थी, एक पुरुष जो खुद को प्रजा का रक्षक कहता है, वो स्त्री का भक्षक है। उसकी पत्नी है , पुत्र है, परिवार है पर फिर भी उसकी वासना कम नहीं होती। उसे प्रेम नहीं चाहिए ह्रदय के किसी भी कोने में कोई स्थान नहीं चाहिए, चाहिए तो सिर्फ एक देह जो उसकी वासना को तृप्त कर सके। उसकी पत्नी को समझाया जाता है समझौता कर ले स्थिति से, जीवन से समंजन कर ले। क्यों? क्यों वो इतनी कमजोर है की उस मनुष्य के साथ रहती है, जो उसका है हीं नहीं या फिर किसीका भी नहीं। समय बदल गया , जीवन के मूल्य और आदर्श बदल गए पर क्या पुरुष और स्त्री की सोच बदली? क्या आज भी स्त्री सिर्फ भोग की वस्तु है?

"योग वशिष्ठ" एक महान किताब जो एक महान पुरुष ने लिखी "श्री वशिष्ट जी" वो बताते है इस किताब में की नारी रक्त और मांस का शरीर है , भ्रमित करने का मार्ग है, आकर्षण की वो माया है जो कभी ख़त्म नहीं होती,
मैं पूछना चाहूंगी उनसे, पुरुष क्या है क्या वो रक्त और मांस से मिलकर नहीं बना, क्या वो आकर्षित नहीं करता स्त्री को? तो सिर्फ मुझे क्यों कहते है "भोग की वस्तु" ? क्योंकि मैं अपनों की प्रसंत्ता के लिए भोग बनने को भी तैयार हू......... या फिर मैं इतनी कमजोर हू...... मेरे पास "भोग " बनने के अलावा और मार्ग नहीं............

पुरुष नहीं बदला , या फिर कहू अधिकतर पुरुष नहीं बदले...... उनके लिए नारी कुछ नहीं रक्त और मांस के अलावा

लोग कहते है पहले विवाह टिकते थे, कलह कम था, नारी पुरुष के रिश्ते मजबूत थे। किसी ने कभी सोचा है क्यों? क्योंकि स्त्री ने कभी कुछ नहीं माँगा उसे बचपन से सीखाया गया जो मिलता है बस वही तेरा है कभी कुछ और मत चाहो। "त्याग" "संतोष" " सहनशीलता" जैसे बड़े बड़े शब्दों के बीच उसे दबा कर रख दिया गया था, और वो खुश थी की यही उसकी जीवन शैली है। और जिस दिन स्त्री ने अपना पक्ष रखा , मायने बदल गए, जमाना बदल गया , जब उसने खुशिया चाही उसे स्वार्थी की संज्ञा दी गयी। और दे दिया ये बोझ की "ये औरत का चरित्र नहीं है" क्यों आखिर क्यों सिर्फ उम्मीद है उससे की वो देती रहे और कभी कुछ न मांगे?

तुलसीदास ने लिखा है
"ढोल गवार शुद्र "पशु" नारी सकल तारना के अधिकारी"
अगर आज तुलसीदास जिंदा होते तो मैं जरूर पूछती उनसे की क्यों उन्होंने मनुष्य को जानवर की श्रेणी में रखा? यहाँ सिर्फ नारी नहीं उस शुद्र की भी तुलना हो रही है जिसका कोई दोष नहीं की वो शुद्र है। मैं समझ नहीं पा रही हू क्यों मुझे इतना कमजोर आँका जा रहा है? क्योंकि भावना मेरे तर्कशक्ति को कमजोर कर देती है।

त्वचा की उज्जवलत्ता , शरीर की बनावट, त्याग , सहनशीलता क्यों परिभाषित करती है स्त्री को?

उसकी सोच, उसकी शैली , उसके कर्म क्यों नहीं देखता कोई ?

रामायण की एक चौपाई याद आती है
"जिय बिन देह, नदी बिन पानी,
तस सियानाथ पुरुष बिन नारी"

स्त्री पुरुष एक दुसरे के पूरक है पता नहीं ये कब समझेंगे लोग?

4 comments:

  1. very good...nice ..i understood everything...

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  2. True,ek din to aayega. Bahut logical ho gayi hoo.

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  3. @pankaj: logical ka to pata nahi par real ho gayi hu, thank you.

    @sanjay: thank u

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