Apr 6, 2011

इच्छाओं का हैं कोई अंत नहीं


इच्छाओं का है कोई अंत नहीं.......................
वो सीप के अन्दर बैठा मोती, खोज में उसकी भटकन है, संतोष का कोई मन्त्र नहीं,

इच्छाओं का है कोई अंत नहीं................

जो मिला वो कम लगा, जो न मिल सका बस उसीका गम लगा,

जो पास है उसको चाहा नहीं, और लगा की चाहत को कभी पाया नहीं,

क्या जो पास है मेरे , है मेरी चाहत, क्यों खोज में सुनती हू, कुछ और ही आहट,

इंसान हू मैं भी , कोई संत नहीं,

इच्छाओं का है कोई अंत नहीं.................

जो देखा वो एक छल था, और छल ही शायद जीवन था,

आपाधापी बस लगी रही, सुलझ-सुलझ के मैं और उलझ गयी,

डोर पूरी खुली पड़ी थी , गाँठ थी कोई बंद नहीं,

इच्छाओं का है कोई अंत नहीं.....................

सुलगी सी भीगी वो लकड़ी,न जलती है न बुझती है,

अगन की तपन और शीत साथ लिए वो जल बुझ कर शायद खुद से ही लडती है,

कोलाहल जो उसके मन में, वो होता कभी मंद नहीं,

क्योंकि इच्छाओं का है कोई अंत नहीं..............................

4 comments:

  1. @how does it matter: thank u sir, seen ur blog, u never mentioned that u write and so well, its really nice.

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