Oct 29, 2011

चल अकेला


राह थी कठिन , खोज करने लगी मैं हमराह की,

धूप से भयभीत शरण खोजने लगी मैं छाह की,

जब-जब गिरी निहारती रही, एक हाथ अपनी ओर ,

भटकती हुयी तलाशती रही, पथ प्रदर्शक की छोर,

ठहर गयी मैं न चली, प्रतीक्षा करती हुयी एक साथ की,

ले आएगा सूरज कोई , इस विचार में गवाती रही नीद मैं हर रात की,

स्वपन से जगी हू अब , वास्तविकता ने दिखलाया है दर्पण,

स्वयं ह़ी तू है स्वयं की, मत मांग किसी और का समर्पण,

अकेले ह़ी पार करनी है राह, हमराह कही गुमराह न कर दे,

छाव की कामना कही, धूप से डर कर न चल दे,

पथ भी तेरा, प्रदर्शक भी तू ह़ी,

अभिनय भी तेरा दर्शक भी तू ह़ी,

लक्ष्य है तेरा , तो अवरोध से भी तुझे ह़ी लड़ना होगा,

और लालसा अगर रखती है स्वर्गलोक की, तो तुझे स्वयं ह़ी मरना होगा...

Jul 24, 2011

थोड़ा सा ज्ञान


मैंने अब ऐसा सोचा है , और सोचा तो शायद तूने भी होगा,

वो जो बीत गया अब लगता बेहतर, पर कल शायद ये आज भी बेहतर होगा,

जो हाथ नहीं वो ठहरा जाए, और जो हाथ में है वो लगा फिसलने,

न कहता न रहता था, जाने फिर वो किसकी लगा था सुनने,

मैं समझाती लाख मगर, चलने लगता वो अपने पैर,

गिरता था, फिर उठ जाता, मेरा साथ उसे अब लगता गैर,

कहता था मुझे नहीं चलूँगा मैं अब तेरे पीछे,

आँखों को हरदम मीचे- मीचे,

आँख खुली सदियों बाद ये मेरी, अब दिखती है मुझको मेरी राह,

चाहा जिसको समझ के अपना, नहीं थी कभी मेरी वो चाह,

दौड़ी मैं भागी फिर, पर दूरी शून्य ह़ी होती थी,

थक-थक के गिर जाती, पर आँख न मेरी सोती थी,

अब जाना उस मार्ग, जो तूने नहीं है दिखलाया,

अज्ञानी, मूरख, और कपटी लोगो ने है नाम धराया,

लोक भय अब नहीं रहा, चित्त भी मेरा है ये समझ गया,

मत भागो उसके पीछे जो सत्य से है दूर रहा,

सुन ले अब मन की हर बात, मष्तिस्क को तू विश्राम दे,

हे ईश्वर बस इतनी विनती अज्ञानी को थोडा सा ज्ञान दे.....

Jul 8, 2011

GEC REWA's GIRLS HOSTEL


हर एक कमरा एक घर था , टीवी के जैसे different चैनल,

बिना बात की बातो में बनते discussion के कितने पैनल,

न टीवी न कंप्यूटर रेडियो भी पास नहीं था,

पर वक़्त गुजरता ऐसे की वक़्त का अहसास नहीं था,

जाने क्या बाते रहती थी, रात गुज़र जाती थी सारी,

और सुबह कॉलेज की कभी न होती टाइम पे तैयारी,

शपथ हर sem के पहले, इस बार लगा देंगे जी और जान,

पर exam के दस दिन पहले syllabus का करते थे ध्यान,

१२ बजे की birth day पार्टी सुबह ६ बजे तक चलती थी,

वार्डेन के आगे रोज़ किसी न किसी बात पे क्लास हमारी लगती थी,

फिर होता एक शपथ समारोह, जो शाम तक टूट जाता था,

और हमारी बदमाशी का बाँध हरदम छूट ह़ी जाता था,

पानी की होली और बिना कारन होती रोज़ दिवाली,

खाने की छीना छपटी में न जाने टूटी कितनी थाली,

जब मैंने वह कदम रखा था अकेली और अनजान थी,

नए नए से सारे चेहरे , किसी से न कोई पहचान थी,

पर वही था देखा असली रिश्ते बनते, जो साथ ह़ी रोते और साथ ह़ी हँसते,

वो अनजाने अजनबी, न जाने कब मेरे अपने हो गए,

कॉलेज का टेरिस और जागी सारी राते अब सब सपने से हो गए,

शान्ति भवन की विंग में रहती थी तीन वो तिकड़ी,

प्यारा जिसे शोर शराबा , मैं जूही और दीप्ती,

socialized society के हम थे कुछ unspecial और unsocial


चेहरे पे smile आज भी आये, जब याद करू engg का hostel

May 17, 2011

भोग की वस्तु



आज कुछ देख रही थी इंडिया का इतिहास

जहा स्त्री भोग की वस्तु से ज्यादा कुछ और नहीं थी, एक पुरुष जो खुद को प्रजा का रक्षक कहता है, वो स्त्री का भक्षक है। उसकी पत्नी है , पुत्र है, परिवार है पर फिर भी उसकी वासना कम नहीं होती। उसे प्रेम नहीं चाहिए ह्रदय के किसी भी कोने में कोई स्थान नहीं चाहिए, चाहिए तो सिर्फ एक देह जो उसकी वासना को तृप्त कर सके। उसकी पत्नी को समझाया जाता है समझौता कर ले स्थिति से, जीवन से समंजन कर ले। क्यों? क्यों वो इतनी कमजोर है की उस मनुष्य के साथ रहती है, जो उसका है हीं नहीं या फिर किसीका भी नहीं। समय बदल गया , जीवन के मूल्य और आदर्श बदल गए पर क्या पुरुष और स्त्री की सोच बदली? क्या आज भी स्त्री सिर्फ भोग की वस्तु है?

"योग वशिष्ठ" एक महान किताब जो एक महान पुरुष ने लिखी "श्री वशिष्ट जी" वो बताते है इस किताब में की नारी रक्त और मांस का शरीर है , भ्रमित करने का मार्ग है, आकर्षण की वो माया है जो कभी ख़त्म नहीं होती,
मैं पूछना चाहूंगी उनसे, पुरुष क्या है क्या वो रक्त और मांस से मिलकर नहीं बना, क्या वो आकर्षित नहीं करता स्त्री को? तो सिर्फ मुझे क्यों कहते है "भोग की वस्तु" ? क्योंकि मैं अपनों की प्रसंत्ता के लिए भोग बनने को भी तैयार हू......... या फिर मैं इतनी कमजोर हू...... मेरे पास "भोग " बनने के अलावा और मार्ग नहीं............

पुरुष नहीं बदला , या फिर कहू अधिकतर पुरुष नहीं बदले...... उनके लिए नारी कुछ नहीं रक्त और मांस के अलावा

लोग कहते है पहले विवाह टिकते थे, कलह कम था, नारी पुरुष के रिश्ते मजबूत थे। किसी ने कभी सोचा है क्यों? क्योंकि स्त्री ने कभी कुछ नहीं माँगा उसे बचपन से सीखाया गया जो मिलता है बस वही तेरा है कभी कुछ और मत चाहो। "त्याग" "संतोष" " सहनशीलता" जैसे बड़े बड़े शब्दों के बीच उसे दबा कर रख दिया गया था, और वो खुश थी की यही उसकी जीवन शैली है। और जिस दिन स्त्री ने अपना पक्ष रखा , मायने बदल गए, जमाना बदल गया , जब उसने खुशिया चाही उसे स्वार्थी की संज्ञा दी गयी। और दे दिया ये बोझ की "ये औरत का चरित्र नहीं है" क्यों आखिर क्यों सिर्फ उम्मीद है उससे की वो देती रहे और कभी कुछ न मांगे?

तुलसीदास ने लिखा है
"ढोल गवार शुद्र "पशु" नारी सकल तारना के अधिकारी"
अगर आज तुलसीदास जिंदा होते तो मैं जरूर पूछती उनसे की क्यों उन्होंने मनुष्य को जानवर की श्रेणी में रखा? यहाँ सिर्फ नारी नहीं उस शुद्र की भी तुलना हो रही है जिसका कोई दोष नहीं की वो शुद्र है। मैं समझ नहीं पा रही हू क्यों मुझे इतना कमजोर आँका जा रहा है? क्योंकि भावना मेरे तर्कशक्ति को कमजोर कर देती है।

त्वचा की उज्जवलत्ता , शरीर की बनावट, त्याग , सहनशीलता क्यों परिभाषित करती है स्त्री को?

उसकी सोच, उसकी शैली , उसके कर्म क्यों नहीं देखता कोई ?

रामायण की एक चौपाई याद आती है
"जिय बिन देह, नदी बिन पानी,
तस सियानाथ पुरुष बिन नारी"

स्त्री पुरुष एक दुसरे के पूरक है पता नहीं ये कब समझेंगे लोग?

Apr 6, 2011

इच्छाओं का हैं कोई अंत नहीं


इच्छाओं का है कोई अंत नहीं.......................
वो सीप के अन्दर बैठा मोती, खोज में उसकी भटकन है, संतोष का कोई मन्त्र नहीं,

इच्छाओं का है कोई अंत नहीं................

जो मिला वो कम लगा, जो न मिल सका बस उसीका गम लगा,

जो पास है उसको चाहा नहीं, और लगा की चाहत को कभी पाया नहीं,

क्या जो पास है मेरे , है मेरी चाहत, क्यों खोज में सुनती हू, कुछ और ही आहट,

इंसान हू मैं भी , कोई संत नहीं,

इच्छाओं का है कोई अंत नहीं.................

जो देखा वो एक छल था, और छल ही शायद जीवन था,

आपाधापी बस लगी रही, सुलझ-सुलझ के मैं और उलझ गयी,

डोर पूरी खुली पड़ी थी , गाँठ थी कोई बंद नहीं,

इच्छाओं का है कोई अंत नहीं.....................

सुलगी सी भीगी वो लकड़ी,न जलती है न बुझती है,

अगन की तपन और शीत साथ लिए वो जल बुझ कर शायद खुद से ही लडती है,

कोलाहल जो उसके मन में, वो होता कभी मंद नहीं,

क्योंकि इच्छाओं का है कोई अंत नहीं..............................