Nov 27, 2010

आग्रह


तुझको खोने का भय हर भय से बड़ा है,

मेरा कठोर, निर्दयी ह्रदय तेरे सामने हार कर खड़ा है,

आपदा कभी कोई डरा न सकी, पर तेरे आंसुओ से मैं डर गया,

जीने की ख्वाहिश है जिन्दा हो उठी, मन उल्लास से है भर गया,

रौद्र सी मेरी ये शख्सियत, बालक की भांति मचल उठी,

कटाक्ष सी तेरी वो दृष्टी, आत्मा को भेद कर गयी,

कल्पना मात्र से तेरी, वशीभूत होकर मैं खो गया,

स्वामी था आज तक अपने मन का, पर अब ये मन तेरा सेवक है हो गया,

जो कभी न झुका, कभी न हिला, वो अहम भी चूर चूर हुआ,

और ये स्वीकारने को मन आज पहली बार मजबूर हुआ,

मायने दें मेरे जीनव को स्वीकार कर, भावना ये समर्पण की,

देह की नहीं, लालसा है बस आत्मा से आत्मा के मिलन की..............