Oct 24, 2010

ब्राह्मण मैं कहलाता हू


उपनाम ही पहचान और, उपनाम ही आचरण है,



गुणवत्ता का तो कुछ पता नहीं, पर कुल कहता है हम ब्राह्मण है,



श्रेष्ठता का मुकुट शीर्ष पे, जनम का वरदान मिला,



संस्कृति में सर्वोत्तम होने का, शैशव से ही ज्ञान मिला,



निरामिष न रह सका कभी, फिर भी सात्त्विक मैं कहलाया हू,



मद-मदिरा का सेवक होकर भी, तामसिकता से अंकितक न हो पाया हू,



जग ने देखे मुझमे जो गुण , उनका मेरे मन में कोई स्थान नहीं,



और ब्राह्मण बने रहने के लिए मैंने किया कभी कोई योगदान नहीं,



व्यवहार को मेरे क्यों तुम , कुलनाम से आँका करते हो,



भूल तुम्हारी निर्णय नीति में, और मुझे दोषी ठहराया करते हो,



जो न जाना कभी किसी ने आज तुम्हे बतलाता हू,



ब्राह्मण का अर्थ न जानू मैं, फिर भी ब्राह्मण मैं कहलाता हू........




5 comments:

  1. सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

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  2. ब्राह्मण का अर्थ न जानू मैं, फिर भी ब्राह्मण मैं कहलाता हू........

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  3. Baht Acche
    और ब्राह्मण बने रहने के लिए मैंने किया कभी कोई योगदान नहीं,
    bahut sahi

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