Oct 3, 2010

खुद से खुद की मुलाकात


भावनाए स्वाभिमान से लड़ती है बार-बार,
मोल किसका है जीवन में ज्यादा, विचारो में होती है तकरार,
क्यूं छोटा है इतना वजूद की, अहम हर कदम संभलता है,
मन के विकार को स्वीकार करने से, क्यूं इतना ये डरता है,
छवि के धूमिल होने का भय, एक भ्रमित छवि को जन्म देता है,
और जो मैं स्वयं नहीं, वो चरित्र मुझमे ही पनप लेता है,
असीमित गति से चलते मन पर नियंत्रण की कोशिश हो जाती है नाकाम,
मैं अगर सब में नहीं तो , क्यूं गूम हो जाती है पहचान,
भीड़ में रहने के लिए मैं बनी भीड़ बार-बार,
फिर खुद की खोज करने के लिए आत्मा ने की गुहार,
खोज की इस यात्रा का अंत मिला वही , जहा से की थी शुरुआत,
निष्कर्ष अंततः मिला यही की, सबसे कठिन है खुद से खुद की मुलाकात..............

8 comments:

  1. आपकी रचनाओं में एक अलग अंदाज है,

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  2. बेशक बहुत सुन्दर लिखा और सचित्र रचना ने उसको और खूबसूरत बना दिया है.

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  3. BAHUT MATURE POEM HAI,

    फिर खुद की खोज करने के लिए आत्मा ने की गुहार,
    खोज की इस यात्रा का अंत मिला वही , जहा से की थी शुरुआत,
    निष्कर्ष अंततः मिला यही की, सबसे कठिन है खुद से खुद की मुलाकात.............. YE LINES BHAUT BAHUT ACCHI HAI LAGTA HAI INHE PADHTE RAHO BARR BAAR BAAR.

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  4. thanks pankaj, tum hamesha meri har kavita padte ho,regular comments karte ho, its really helps in improvement, aur ha motivation bhi milta hai, to thanks for giving ur precious time.

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  5. i like each and every one. and i read them again again.

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  6. Good one sup. never mentioned that you write and write so well!

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  7. @Rupak Rewa
    sir aap se kya mention karti aake saamne to abhi bacchi hu,bas margdarshan karte rahiye shayad likhna seekh jau.

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