Oct 24, 2010

ब्राह्मण मैं कहलाता हू


उपनाम ही पहचान और, उपनाम ही आचरण है,



गुणवत्ता का तो कुछ पता नहीं, पर कुल कहता है हम ब्राह्मण है,



श्रेष्ठता का मुकुट शीर्ष पे, जनम का वरदान मिला,



संस्कृति में सर्वोत्तम होने का, शैशव से ही ज्ञान मिला,



निरामिष न रह सका कभी, फिर भी सात्त्विक मैं कहलाया हू,



मद-मदिरा का सेवक होकर भी, तामसिकता से अंकितक न हो पाया हू,



जग ने देखे मुझमे जो गुण , उनका मेरे मन में कोई स्थान नहीं,



और ब्राह्मण बने रहने के लिए मैंने किया कभी कोई योगदान नहीं,



व्यवहार को मेरे क्यों तुम , कुलनाम से आँका करते हो,



भूल तुम्हारी निर्णय नीति में, और मुझे दोषी ठहराया करते हो,



जो न जाना कभी किसी ने आज तुम्हे बतलाता हू,



ब्राह्मण का अर्थ न जानू मैं, फिर भी ब्राह्मण मैं कहलाता हू........




Oct 3, 2010

खुद से खुद की मुलाकात


भावनाए स्वाभिमान से लड़ती है बार-बार,
मोल किसका है जीवन में ज्यादा, विचारो में होती है तकरार,
क्यूं छोटा है इतना वजूद की, अहम हर कदम संभलता है,
मन के विकार को स्वीकार करने से, क्यूं इतना ये डरता है,
छवि के धूमिल होने का भय, एक भ्रमित छवि को जन्म देता है,
और जो मैं स्वयं नहीं, वो चरित्र मुझमे ही पनप लेता है,
असीमित गति से चलते मन पर नियंत्रण की कोशिश हो जाती है नाकाम,
मैं अगर सब में नहीं तो , क्यूं गूम हो जाती है पहचान,
भीड़ में रहने के लिए मैं बनी भीड़ बार-बार,
फिर खुद की खोज करने के लिए आत्मा ने की गुहार,
खोज की इस यात्रा का अंत मिला वही , जहा से की थी शुरुआत,
निष्कर्ष अंततः मिला यही की, सबसे कठिन है खुद से खुद की मुलाकात..............