Sep 17, 2010

व्यस्तता ने मारा है मुझको


दौलत है पास है शोहरत है, पास केवल वक़्त नहीं,

वक़्त से हारा है ये दिल , वरना ये इतना भी सख्त नहीं,

समय जब खुद ही अपना नहीं, तो कैसे ये किसी और को दू,

व्यस्तता ने मारा है मुझको, वरना इच्छा तो मेरी भी है की सबकी मदद करू,

छुट्टी का केवल एक दिन जो खुद ही पूरा पड़ता नहीं,

जनसेवा तो करनी है, पर मैं समय से ज्यादा लड़ता नहीं,

जब छोटा था तब सोचा करता था, नहीं चलूँगा दुनिया की बनाई पटरी पे,

पर भीड़ में शामिल कब पता नहीं, घिर गया इस comman छतरी से,

कल एक हाथ उठा था आस में, की मैं भी हाथ बड़ाउंगा,

खून से लथपथ उस अधमरे शरीर का सहारा मैं बन पाऊंगा,

हाथ बढाना चाहा था मैंने, पर कल deadline थी प्रोजेक्ट की,

प्रोजेक्ट और इंसान में, obviously प्रोजेक्ट था ज्यादा कीमती,

सोचता रहता हू मैं दिनभर दुनिया को कैसे बदलना है,

रोज़ ये निर्णय लेता हू की बस अब ground लेवल पे जाके कुछ करना है,

पर ऑफिस और घर की जिम्मेदारी से मैं कैसे मुक्ति लू,

व्यस्तता ने मारा है मुझको, वरना इच्छा तो मेरी भी है की मैं सबकी मदद करू.......
सुप्रिया...........

5 comments:

  1. This is really good try :)
    i really like the way you had tried.
    but personally i am not completely with your lines, hope you will forgive me for that.

    well, I am Swapnil Mr.pankaj gautam friend .

    - Swapnil

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  2. thanks swapnil for reading and commenting, it is just a squid.may be you are having other views.its just my views about proffesional pepole.

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  3. Nice Supriya....how closely u could observe life...?
    I think the way thought and see the life from common man point of view is really admirable.

    keep going..

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