Sep 23, 2010

राजधानी


बैलगाड़ी और रेलगाड़ी से होते हुए मैं पहुची राजधानी,


बड़ी सड़क और बड़ी ईमारत की सुनी थी कई कहानी,


सपनो में देखा करती थी, वो चौड़ी सड़के और मेट्रो की सवारी,


धक्का-मुक्की करके जब जॉब मिली दिल्ली में, तो ख़तम हुयी सारी लाचारी,


स्टेशन पे जब उतरी थी, तो किसी ने जबदस्ती मेरा सारा सामान खुद पे लाद लिया था ,


और मुझसे बिना पूछे पूरा बोरा बिस्तर एक ऑटो में डाल दिया था,


सुना था दिल्ली दिलवालों की, पर बिना मुद्रा दिल खुश होते ही नहीं,


शो ऑफ़ की इस नगरी में बिना मेकप लोग सोते भी नहीं,


डिब्बो से कमरों को लोग यहाँ घर कहा करते है,


यहाँ न जाने क्यूं सब पैसो की भाषा में ही बात किया करते है,


एक कमरा मिला मुझे , जिसे मैं घर नहीं कह पायी थी,


गड्ढे और ट्रैफिक से भरी सड़के , तो मेरे सपनो में भी नहीं आई थी,


सोने पे सुहागा तब हुआ, जब बारिश का मौसम आया था,


रोड रूपी नदी ने मुझे मेरे गाव का तालाब याद दिलाया था,


फर्क बस इतना था की, वो पानी निर्मल और उज्जवल था,


और यहाँ रोड पे हर दूसरी तरफ शिवर का ढक्कन खुला था,


बारिश से इतनी नफ़रत शायद पहले कभी नहीं थी,


सपनो में अब गाव की उची नीची मेड दिखा करती थी,


यहाँ के मच्छर भी गाव के मच्छर से ज्यादा बलवान थे,


मलेरिया जैसी बीमारी देना समझते शान के खिलाफ थे,


डेंगू , swine फ्लू बड़े शहर के बड़े थे रोग,


फायरिंग और बम ब्लास्ट न्यूज़ में डेली का डोज़ ,


गर्मी की प्रचंड धूप, और सर्दी का कोहरा दिल्ली में कुदरत का वरदान है ,


चोर-डकैती , क्राइम की दुनिया में दिल्ली हमेशा रखता अपना नाम है,


लाख कोशिश करती हू, पर नहीं है मिलती राह पुरानी,


सोच में उलझी बैठी हू की कब छूटेगी "राजधानी"........................


7 comments:

  1. BAHUT ACCHA LIKHA HAI. KAFI MAZA AYA PADH KE.
    रोड रूपी नदी ने मुझे मेरे गाव का तालाब याद दिलाया था,

    THIS LINE IS AWESOME.

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  2. पुरानी डगर कमजोर तलाशा करतें हैं, कर्मठ तो पहाड़ों में भी राह निकाला करतें हैं

    दिल्ली आज भी दिल वालों की , पर दिल को पहचानने वाले आजकल दिल्ली कम ही आया करतें है

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  3. @rahul dev sharma
    are main to pahad se aayi hi hu, is aas me ki ab pahad na mile par.........

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