Jul 18, 2010

मैं पतिता हू


नष्ट, भ्रष्ट, और पतित , न तो हू शोभनीय और न ही मर्यादित,

देह के इस संसार में मैं एक जलती चिता हू,

मनुष्य हू मैं बाद में पहले "मैं एक पतिता हू " ,

कभी कौड़ियो के मोल तो कभी अशर्फियों में मैं तौली गयी,

कभी दूसरो के हाथ तो कभी अपनों की नीलामी में मैं बोली गयी,

खरीद और बिक्री के इस व्यापार में , कभी सबसे सस्ती तो कभी सबसे महगी गयी,

आत्मा न देखी किसीने बस त्वचा की उज्जव्ल्लता से मैं परखी गयी,

परदे की आड़ में , बेपर्दा हुयी मैं बार बार,

दोष देकर मुझे , इज्जत से बैठे है धर्म के ठेकेदार,

दुनिया की हर त्रुटी आकर मुझमे है समां जाती,

भाव में बहती और नैतिकता में ठहर सी जाती,

गंगा हू मैं भी लेकिन मैं सजीव हू,

इसीलिए चरित्रवानो के लोक में मैं थोड़ी सी अजीब हू,

मानवता का पाठ सीखाने वाले , धर्म की गुहार लगाने वाले,

मेरे दर पे धर्म निरपेक्ष होकर, मिलाते है प्याले से प्याले,

हर वर्ग , हर श्रेणी , हर भेद में बहती मैं एक सरिता हू,

मनुष्य हू मैं बाद में , पहले "मैं एक पतिता हू"...........

सुप्रिया....