May 21, 2010

दौड़ भाग के जीवन में


दौड़ भाग के जीवन में , कभी तो ठहराव लाओ,

कभी तो छूटे कोई ट्रेन, कभी तो बचपन को दुहराओ,

दौड़ भाग के जीवन में कभी तो ठहराव लाओ.......

सुबह की चाय का प्याला, और सूरज का आँगन में आना,

आँख मूँद कर सपनो की दुनिया में फिर खो जाना,

चिडियों की चहचहाहट को, कभी तो फिर से तुम गाओ,

दौड़ भाग के जीवन में , कभी तो ठहराव लाओ......

बारिश की गीली मिट्टी की खुशबू का साँसों में बस जाना,

टूटे फूटे से रेत के घर पे बार-बार इतराना,

भूल के सारी जिम्मेदारी , कभी तो फिर से बेवजह तुम मुस्काओ,

दौड़ भाग के जीवन में, कभी तो ठहराव लाओ........

कागज की नाव की रेस लगाना, कटी पतंगों को चुराना,

छोटी-छोटी सी बातो पे, हर बड़ी बात को बिसराना,

नज़र छुपाते बचते-बचते , कभी तो फिर से कोई गलती तुम कर जाओ,

दौड़ भाग के जीवन में, कभी तो ठहराव लाओ........

क्लास बंक करके पिक्चर जाना, पकडे जाने पे तैयार बहाना,

चिल्लर पैसे जोड़कर , restaurant में खाना खाना,

भूल के अपना सारा ego, कभी तो फिर से कोई बाज़ी तुम हार जाओ,

दौड़ भाग के जीवन में कभी तो ठहराव लाओ.........

बीत गया तो नहीं मिलेगा , समय का पहिया चलता ही रहेगा,

कल की सोच में उलझे-उलझे, सुलझे आज को मत ठुकराओ,

दौड़ भाग के जीवन में , कभी तो ठहराव लाओ...............
supriya...................





8 comments:

  1. wah janab.bahut acha collection hai.


    www.vibhutrivedi.blogspot.com

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  2. आपकी रचनाओं में एक अलग अंदाज है,

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  3. काफी सुन्दर शब्दों का प्रयोग किया है आपने अपनी कविताओ में सुन्दर अति सुन्दर

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  4. no doubt kavita bahut acchi hai par
    i am disagree with your concept.
    i feel
    chalana hi jindigi hai
    nadi ka kal kal bahna hi jindigi hai
    asman ki uchayioon ko choona jindigi hai
    ek kaidi se pooncho tahrao hi maut hai
    ek retired insaan se pooncho

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  5. This comment has been removed by the author.

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  6. a poem from great poet nagarjuna
    पूरी स्पीड में है ट्राम
    खाती है दचके पे दचका
    सटता है बदन से बदन -
    पसीने से लथपथ|
    छूती है निगाहों को
    कत्थई दांतों की मोटी मुस्कान
    बेतरतीब मुछो की थिरकन
    सच सच बतलाओ
    घिन तो नहीं आती है?
    जी तो नहीं कड़ता है?

    कुली मजदूर है
    बोझा ढोते हैं खीचते है ठेला
    धुल धुआं - भाप से पड़ता है साबका
    थके मांदे जंहा तंहा हो जाते है ढेर
    सपने में भी सुनते हैं धरती की धड़कन
    आकर ट्राम के अन्दर पिछले डब्बे में
    बैठ गए हैं इधर - उधर तुमसे सटकर
    आपस में उनकी बतकही
    सच सच बतलाओ
    नागवार तो नहीं लगता है
    जी तो नहीं कड़ता है?
    घिन तो नहीं आती है?

    ढूध - सा धुला सादा लिबास है तुम्हारा
    निकले हो शायद चौरंगी की हवा खाने
    बैठना था पंखे के निचे, अगले डिब्बे में
    ये तो बस इसी तरह
    लगायेंगे ठहाके, सुरती फकेंगे
    भरे मुह बातें करेंगे अपने देश कोस् की
    सच सच बतलाओ
    अखरती तो नहीं इनकी सोहबत
    जी तो नहीं कड़ता है?
    घिन तो नहीं आती है?

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