May 21, 2010

दौड़ भाग के जीवन में


दौड़ भाग के जीवन में , कभी तो ठहराव लाओ,

कभी तो छूटे कोई ट्रेन, कभी तो बचपन को दुहराओ,

दौड़ भाग के जीवन में कभी तो ठहराव लाओ.......

सुबह की चाय का प्याला, और सूरज का आँगन में आना,

आँख मूँद कर सपनो की दुनिया में फिर खो जाना,

चिडियों की चहचहाहट को, कभी तो फिर से तुम गाओ,

दौड़ भाग के जीवन में , कभी तो ठहराव लाओ......

बारिश की गीली मिट्टी की खुशबू का साँसों में बस जाना,

टूटे फूटे से रेत के घर पे बार-बार इतराना,

भूल के सारी जिम्मेदारी , कभी तो फिर से बेवजह तुम मुस्काओ,

दौड़ भाग के जीवन में, कभी तो ठहराव लाओ........

कागज की नाव की रेस लगाना, कटी पतंगों को चुराना,

छोटी-छोटी सी बातो पे, हर बड़ी बात को बिसराना,

नज़र छुपाते बचते-बचते , कभी तो फिर से कोई गलती तुम कर जाओ,

दौड़ भाग के जीवन में, कभी तो ठहराव लाओ........

क्लास बंक करके पिक्चर जाना, पकडे जाने पे तैयार बहाना,

चिल्लर पैसे जोड़कर , restaurant में खाना खाना,

भूल के अपना सारा ego, कभी तो फिर से कोई बाज़ी तुम हार जाओ,

दौड़ भाग के जीवन में कभी तो ठहराव लाओ.........

बीत गया तो नहीं मिलेगा , समय का पहिया चलता ही रहेगा,

कल की सोच में उलझे-उलझे, सुलझे आज को मत ठुकराओ,

दौड़ भाग के जीवन में , कभी तो ठहराव लाओ...............
supriya...................





May 16, 2010

चित्त की व्यथा


रात बीत गयी ये सोचते हुए की रात भर हम क्यों न सो सके,

बेवजह क्यों है इतनी वजह की हम वजह ही न खोज सके,

दूर से दीखता है सब कुछ, पास आने पे सब है मरीचिका,

कभी पानी की प्यास , तो कभी कस्तूरी की तृष्ना,

संतो के साथ किया सत्संग , और कपटी के भी विचार जाने,

दूसरो में खोज रहे है हम जिंदगी के मायने,

पता नहीं किस चीज की तलाश है, क्या है मेरी मंजिल और जाना किस राह है,

जो मिल गया वो नहीं था चाहिए, और चाहत से हम खुद ही अन्जान है,

जीवन का मकसद खो सा गया है, खोज भी अधूरी सी आज है,

स्वप्न है ये जिंदगी या वास्तविकता का झूठा ये जाल है,

कहाँ से की आरम्भ और कहाँ है अंत यात्रा का लक्ष्य भ्रम का ही तो मार्ग है,

चित्त की व्यथा का वर्णन लेखनी के सक्षमता से परे आज है................

supriya...............