Apr 10, 2010

कभी मोह का बंधन, कभी माया का जाल


भू लोक के बवंडर में फसता ही गया मैं,

सुलझने की कोशिश में उलझता ही गया मैं,

कभी बैठा नहीं सोचा नहीं मशीन बनकर मैं जीता रहा,

मदिरा को समझ गंगाजल हर घूँट मैं पीता रहा,

कभी मोह का था बंधन, कभी माया का जाल था,

सोने के पिंजरे में कैद पंछी सा मेरा हाल था,

स्वप्न से कभी जागा नहीं, नीद में उम्र भर चलता रहा,

भंवर को समझ किनारा ,नौका की सवारी मैं करता रहा,

पिंजरे को समझा आकाश, और मेरी हर उड़ान पिजरे में ही सीमित हुई,

जब छूटने लगी काया, चेतना भी तभी जीवित हुई,

भौतिकता को समझ आनंद का बीज , जीवन पर्यंत ये बीज मैं बोता गया,

और कुछ पाने की चाह में , न जाने क्या-क्या मैं खोता गया......................

supriya.....................

6 comments:

  1. ise pdh kr lg rha hai ki main aur juhi mil kr tere upr khoob hanse...kyoki ye teri purani kavita kitrah h

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  2. really good one, life of every individual.sab moh maya hai.

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  3. हमेशा की तरह उम्दा रचना..बधाई.

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  4. hanse ,itni khatarnak poem padh kar bhagwan jaane kya kare aur tu hasne ki baat kar rahi hai

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