Apr 3, 2010

कविता


कविता का क्या अर्थ है , ये आकर मुझे समझा दे कोई,

मुझ नासमझ को कविता लिखना सीखा दे कोई,

"क" किसके लिए,"व्" का क्या मतलब है,

"त" का अर्थ न समझू मैं,ये मेरे लिए सिर्फ अक्षर है,

"क" से कागज, "व्" से विज्ञ ,क्या "त" से ताल होता है,

कागज़ पे विज्ञ का ताल से लिखना क्या कविता होता है,

नहीं-नहीं "क" से कोमल, "व्" से वाणी, "त" से तराना होता है,

कोमल वाणी तराना लिखे यही तो कविता होता है,

मैं मूर्ख ये भी न जानू , कविता होता है की होती है,

क्या "क" से कलम , "व्" से वक़्त , "त" से तन्हाई होती है,

क्या कविता क्या इसका भाव क्या भावार्थ होता है,

मैं तो समझू कविता के तीन अक्षर में सारा ब्रम्हांड सोता है...................

supriya...............

8 comments:

  1. good one sahi hai. ham to tumahre bharose baithe the ki tum samjhaogi ki kavita kya hoti hai ummede toot gain

    ReplyDelete
  2. waiting for next one, sunday ahead

    ReplyDelete
  3. कल और आज
    अभी कल तक
    गालिया देते थे तुम्हे
    हताश खेतीहर

    अभी कल तक
    धूळ में नहाते थे
    गौरैयोन के झुंड

    अभी कल तक
    पथरायी हुई थी
    धनहर खेतो की माटी

    अभी कल तक
    दुब्के पडे थे मेढक
    उदास बद्रंग था आसमान

    और आज
    उपर ही उपर तन गये है
    तुम्हारे तंबू

    और आज
    छाम्का रही है पावस रानी
    बूंद बुंदी कि अपनी पायल

    और आज
    चालू हो गई है
    झइंगूर की सेहनाई अविराम

    और आज
    जोर से कूक पडे
    नाचते थिरकते मोर

    और आज
    आ गई वापीस जान
    डूब की झुल्सी शिराओ के अंदर .

    ReplyDelete
  4. आत्मज्ञान
    मिटाकर अहंकार
    करो परोपकार
    मिथ्या है संसार
    सत्य हॆ परमार्थ ।

    मिटाकर अहंकार
    करो ज्योतिर्मय संसार
    हो कीर्ति रश्मियों का विस्तार
    जीवन हॆ सेवार्थ ।

    मिटाकर विकार
    अर्थलोभ को नकार
    हो जाओ ईश से एकाकार
    रहो तत्पर ज्ञानार्थ

    मिटाकर मन का मालिन्य
    दिलों में प्रेम को निखार
    करो सत्य को साकार
    हो सेवा निस्वार्थ

    ReplyDelete
  5. दे न सके सन्देश सही


    व्यतीत अतीत के इतिहासों का,
    किंचित भी आभास नहीं
    भावी कल के विश्वासों का ,
    कुछ भी तो आधार नहीं

    देख पाए न नियति न्याय,
    खड़े यहा हम तो निरुपाय
    उलझी सी मंजिल लगाती है,
    पर गति को विराम नहीं

    बढे कदम तो कुछ भी पाए ,
    पड़े रहे रहे तो शून्य मही
    आदर्शो की लिए विरासत ,
    पर वैसा आचार नहीं

    कथित भद्रजन पीकर हाला,
    फेर रहे मूल्यों की माला
    नित्य नवीन अभिनय दिखला कर ,
    दे न सके सन्देश सही

    ReplyDelete
  6. Bdi technical kavita hai.tujhe to itni lmbi kavita me comment milte h kya baat hai.

    ReplyDelete
  7. tum likho deepti tumhe bhi milega

    ReplyDelete
  8. जीवन की विडंबनाओ को दर्शाती के उत्तम रचना...

    ReplyDelete