Apr 24, 2010

मेरा भाई


This poem is for my brother "Rajat"


लड़ना, झगड़ना और अकड़ना बस यही था एक रिश्ता प्यारा,

कभी लूडो तो कभी विडिओ गेम बनता युद्ध क्षेत्र हमारा,

वो बाल खीचता मेरे, मैं पैर से मारा करती थी,

लड़ती भी थी उसीके साथ, साथ उसीके हँसती थी,

हारने लगती जब मैं पापा से शिकायत करती थी,

पड़ती थी जब उसको मार साथ में मैं भी रोया करती थी,

माँ जो करती उसका ज्यादा लाड कितना मैं चिढा करती थी,

उसकी जितनी height पाने के लिए दरवाजे से लटका करती थी,

मैं उसके साथ क्रिकेट , वो मेरे साथ घर-घर खेला करता था,

कभी भाई तो कभी उसमे दोस्त मिला करता था,

आज भी बचपन मेरा उसके आगे जी उठता है,

इस मतलब की दुनिया में , निस्वार्थ प्यार ही उससे मिलता है,

चपत मरता है कभी, कभी है पोछे आंसू उसका हाथ,

पास मेरे एक ऐसा रिश्ता जो नहीं है बदला वक़्त के साथ...............

supriya.........

Apr 10, 2010

औरत


एक सपना देखा है अब हमने इन आँखों में,

उड़ेंगे ऊँचा आकाश की बाहों में ,

नहीं जियेंगे किसी सहारे, बन जायेंगे हम खुद ही सहारा,

नहीं चाहिए कोई नाविक, खुद ढूँढेंगे हम अपना किनारा,

देना सीखेंगे उनको, जिन्होंने देना सीखलाया,

नहीं चुनेंगे अब वो मार्ग,जो परिपाटी ने दिखलाया,

अब इन सपनो को हम हकीकत का नाम देंगे,

इस दुनिया में औरत को सिर्फ उसी की पहचान देंगे,

अब न होगी कोई अग्नि परीक्षा, और नहीं चाहिए अब वो राम,

जिसने अपनी ही सीता को भेज दिया वनवास,

अपने नाम के आगे किसी और नाम की नहीं करेंगे तलाश,

खुद ही चुनेंगे अपनी धरा, और अपनी ही शर्तो पे जीतेंगे अपना आकाश......................

supriya.................


कभी मोह का बंधन, कभी माया का जाल


भू लोक के बवंडर में फसता ही गया मैं,

सुलझने की कोशिश में उलझता ही गया मैं,

कभी बैठा नहीं सोचा नहीं मशीन बनकर मैं जीता रहा,

मदिरा को समझ गंगाजल हर घूँट मैं पीता रहा,

कभी मोह का था बंधन, कभी माया का जाल था,

सोने के पिंजरे में कैद पंछी सा मेरा हाल था,

स्वप्न से कभी जागा नहीं, नीद में उम्र भर चलता रहा,

भंवर को समझ किनारा ,नौका की सवारी मैं करता रहा,

पिंजरे को समझा आकाश, और मेरी हर उड़ान पिजरे में ही सीमित हुई,

जब छूटने लगी काया, चेतना भी तभी जीवित हुई,

भौतिकता को समझ आनंद का बीज , जीवन पर्यंत ये बीज मैं बोता गया,

और कुछ पाने की चाह में , न जाने क्या-क्या मैं खोता गया......................

supriya.....................

Apr 3, 2010

कविता


कविता का क्या अर्थ है , ये आकर मुझे समझा दे कोई,

मुझ नासमझ को कविता लिखना सीखा दे कोई,

"क" किसके लिए,"व्" का क्या मतलब है,

"त" का अर्थ न समझू मैं,ये मेरे लिए सिर्फ अक्षर है,

"क" से कागज, "व्" से विज्ञ ,क्या "त" से ताल होता है,

कागज़ पे विज्ञ का ताल से लिखना क्या कविता होता है,

नहीं-नहीं "क" से कोमल, "व्" से वाणी, "त" से तराना होता है,

कोमल वाणी तराना लिखे यही तो कविता होता है,

मैं मूर्ख ये भी न जानू , कविता होता है की होती है,

क्या "क" से कलम , "व्" से वक़्त , "त" से तन्हाई होती है,

क्या कविता क्या इसका भाव क्या भावार्थ होता है,

मैं तो समझू कविता के तीन अक्षर में सारा ब्रम्हांड सोता है...................

supriya...............