Mar 25, 2010

गरीब


कचरे में जन्मा एक जानवर बदनसीब हू मैं,

किसी भी चोट से जिसे दर्द होता नहीं ,हां वही , एक गरीब हू मैं,

न तो धूप लगती है, न ही तपती ज़मीन से पैर जलता है,

हमारे पेट को तो चार दिन का बासी खाना भी अमृत सा लगता है,

mercedes में बैठा बच्चा पलट के बार-बार मुझे देखता है,

क्या ये भी मेरी तरह इंसान है, बार-बार वो ये सोचता है,

पर मुझे तो है सिर्फ रोटी की चाहत, और इसी रोटी के लिए जिंदगी से जिंदगी भर लड़ता हू मैं,

और फिर इसी रोटी के लिए, जूते,चप्पल , हर चीज़ से हर रोज़ पिटता हू मैं,

ऊँची गद्दी पे बैठे लोग "गरीबी हटाओ" जैसी हर रोज़ कुछ नयी scheme बनाते है,

और इन scheme से वो और अमीर और हम और गरीब होते जाते है ,

अमीरों से थोडा अलग , हां थोडा अजीब हू मैं,

नफरत है दुनिया को जिससे, हां वही, वही गरीब हू मैं...............
supriya.............

2 comments:

  1. kavita acche si likhi hai par garibi ka warnan upar upar se hai. aur jada gahrai se liki ja sakti thi. overall very good work.

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  2. जीवन की विडंबनाओ को दर्शाती के उत्तम रचना...

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