Mar 21, 2010

मेरी साख का एक फूल







मेरी साख का एक फूल जो टुटा तो मैं भी टूट गया था,



दुनिया और ईश्वर से तब मैं कितना रूठ गया था,



मेरा ही फूल क्यों टुटा, क्यों मेरा ही अपना छूटा,



क्यों दर्द दिया मुझको ही तूने, मैंने तेरा क्या था लूटा,



लड़ता था मैं ईश्वर से और यही मैं सोचा करता था,



कही नहीं उसका अस्तित्तव , दिन रात जिसे मैं पूजा करता था,



देखा फिर एक ऐसा मधुवन , जिसका हर फूल था मुरझाया,



जब जाना उसका दर्द तो मैं, अपने आप पे मुस्काया,



फिर भीड़ से गुजरा तो, हर सूरत में अपनी ही सूरत पायी,
और हर हसती सूरत के पीछे , खुशियों की टूटी-फूटी एक मूरत पायी............................
supriya...............

1 comment:

  1. nice words last 4 lines are little bit confusing. i read 5 times i am still unable to conclude.

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