Mar 26, 2010

उड़ान


बादलो के परे देखा है एक आसमान,

और आसमान को छूने के लिए भरी है अब उडान,

जानती हू कठिन है मेरी मंजिल और राह भी आसन नहीं,

पर हार के रुकना मेरी भी तो पहचान नहीं ,

गिर के उठना सीख लिया है तो गिरने से अब मैं डरती नहीं,

और अँधेरा कितना भी गहरा हो उजाले की उम्मीद मरती नहीं,

कितनी भी विषम हो परिस्थितिया मैं मानूगी हार नहीं ,

क्योंकि घनघोर अँधेरे के बाद ही आती है फिर एक भोर नयी.............
supriya................

3 comments:

  1. First poem positive one. good start, i liked this one very much.

    ReplyDelete
  2. भावों को इतनी सुंदरता से शब्दों में पिरोया है
    सुंदर रचना....

    Sanjay kumar
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    ReplyDelete
  3. आपकी यह कविता बहुत ही प्रेरित करने वाली है

    ReplyDelete