Mar 25, 2010

जीवन







अथाह, असीमित , अपरिमेय मकाम है,



जीवन अविरलता का ही तो उपनाम है,



पथ में पुष्प है कभी, तो कभी शूल है,



कभी कपास सा है कोमल, तो कभी ये कुशाग्र त्रिशूल है,



क्षण- क्षण में है परिवर्तन, अस्थिरिता का ये पर्याय है,



भोर है कभी,कभी है संध्या, अनिश्चित्ता ही तो इसका कार्य है,



कभी दुविधा में डगमगाता हुआ कदम, कभी चट्टान सा अटल है ये,



कभी निर्मल निर्धन की कुटिया, तो कभी भव्य कठोर सा महल है ये,



माँ की थपकियो सा कभी, कभी पिता की फटकार सा,



कभी विजयश्री की खुशिया, तो कभी विषादी हार सा,



विविध रस,छंद,अलंकार भिन्न-भिन्न भाव है इसमें भरे,



समझ समझ के बस इतना ही समझा , जीवन है समझ से परे...........................



supriya..............

1 comment:

  1. god one .how you write such a good poem i am unable to understand such a strong vocabulary in hindi.good work. the poem in really heart touching.

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