Mar 21, 2010

मेरी माँ


मेरी नीद ही सोती और मेरी नीद ही जगती है,

मैं रोऊ तो रोती वो और मेरी हँसी वो हँसती है,

मेरे बिन बोले ही समझ लेती है वो मेरी भूख प्यास,

क्या ये सच है की "माँ" में है ईश्वर का वास ?

जब से मैंने जन्म लिया , वो मुझे छोड़ कुछ सोचती नहीं,

मेरी खुशिया ही उसकी खुशिया, और कही ख़ुशी वो खोजती नहीं,

स्कूल से देर से लौटू तो, दरवाजे पे खड़ी मिलती है,

मेरी पांच मिनट की देरी और, उसकी चिंता आसमान को छूने लगती है,

मेरी हर चाहत,हर खाव्हिश हर कीमत पे पूरा करती है,

और मेरे कारण ही वो पापा से भी लड़ती है,

"माँ" के दिल में मैं बसी हू, और वो मुझमे ही जिया करती है,

आखिर मैंने जाना "माँ" में ईश्वर नहीं, हर ईश्वर में एक "माँ" बसती है...........

supriya.............

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