Mar 15, 2010

धर्म


हिन्दू बना कभी,कभी वो मुसलमान बना ,
धर्म के नाम पे ,न जाने कितनी बार वो हैवान बना,
मंदिर को तोड़ा कभी, मस्जिद पे कभी वार किया,
हर धर्म के सार पे अपने हथियारों से प्रहार किया,
मजहब के लिए लड़ते लड़ते रहा अब वो इंसान भी नहीं,
खून से लिखता है वो अपने धर्म अब उसका कोई ईमान भी नहीं,
मर गया वो सीख कर,जो किसी धर्म ने उसे न था सीखलाया,
और उसके मरने के बाद कुछ धर्मराजो ने हैवानियत को पहना त्याग का चोला लोगो को दिखलाया,
लोग फिर उठे है हिन्दू और मुसलमान बनने के लिए , धर्म का ढ़ोग करके अधर्म की राह पे चलने के लिए,
जो गलतिया इनसे हुई खुदा करे कोई और न कर सके,
धर्म पे लड़ने वाले लड़ने के पहले गीता कुरान पढ सके..................
supriya....................

1 comment:

  1. well kafi sanwedanseel poems hai. kai bar padhna padega mujhe inhe .Par Kanhunga bahut accha likha hai aise hi likthe rahna har nai kavita ka intazzar karunga.

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