Mar 15, 2010

थोड़ी सहमी थोड़ी डरी हू मैं


थोड़ी सहमी थोड़ी डरी हू मैं
यथार्थ के धरातल पर फिर अकेली खड़ी हू मैं
वृक्ष के साए में धूप से बचकर थी अब तक खड़ी
पर आज खुद ही वृक्ष बनने की है आई घड़ी
उत्तरदायित्तव से आज फिर घिरी हू मैं
थोड़ी सहमी थोड़ी डरी हू मैं.......................
मल्लाह के प्रतिनिधित्तव में नौका पे किया अब तक सफ़र ,
पर आज नौका लगानी है पार मुझे ही मल्लाह बनकर ,
लहरों पे डगमगाती नौका को लेकर आज फिर आगे बढी हू मैं,
थोड़ी सहमी थोड़ी डरी हू मैं....................
चिरागों की रौशनी में मैं अब तक प्रकाशित ही रही,
पर आज रौशनी के लिए खुद ही जलने की है आई घड़ी,
उजाले की चाह में अन्धकार से आज फिर लड़ी हू मैं,
थोड़ी सहमी थोड़ी डरी हू मैं.................
समय का चक्र है ये, ये चक्र चलता ही रहेगा,
मधुवन में कभी फूल तो कभी माली ये बनता रहेगा ,
पर मन चंचल है , तो कभी ये रूकेगा भी और डरेगा भी ,
पर "परिवर्तन संसार का नियम है "ये सोचकर ये चलेगा भी और बढेगा भी,
समय के इस फेर से आज पहली बार मिली हू मैं,
इसीलिए थोड़ी सी सहमी और थोड़ी सी डरी हू मैं.............
supriya.......................

4 comments:

  1. Best of four . I am not getting words for this poem thoda sahma dara hun mai.

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  2. AB TO BEHOSH HO CHUKI HOON MEIN

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  3. tu behosh kyon ho gayi be.............

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