Mar 28, 2010

मोहब्बत


मैं भी कभी हँसा करती थी, किसी से हक़ से लड़ा करती थी,

सपनो की दुनिया से मैं भी कभी जुड़ा करती थी,

लौट आता था सारा बचपन , जब वो डाट कर समझाया करता था,

और फिर गोद में अपने सर रखकर, लाड जताया करता था,

मिट जाती सारी तकलीफे, जब उसकी बाहों में सिमटती थी,

तब दुनिया की सारी खुशिया, मेरे दामन में ही तो बसती थी,

पर झूठा था उसका सारा प्यार, झूठा था सपनो का वो संसार,

झूठे थे उसके सारे वादे, झूठा था उसका हर इकरार,

पर आज भी सच मान उन्हें,इन्तजार किया करती हू,

और आज भी, मैं सिर्फ उन्ही सपनो से प्यार किया करती हू,

जानती हू कुछ नहीं मिलेगा, फिर भी दुआ में उसे ही माँगा करती हू,

अब कभी लडती है किस्मत मुझसे, और कभी मैं किस्मत से लड़ा करती हू,

गम बस इतना है की, उसके आने की आस मरने भी नहीं देती है,

और दर्द के इस मंजर को दुनिया ""मोहब्बत"" कहती है........................

supriya............

Mar 26, 2010

धर्म या कर्म




धर्म ने बाटा जनमत को,भेद धर्म ने सीखलाया,

जाती-पाती में बाट के मानव को, बैर है मन में उपजाया,

नफरत के काटे बोये है,मानवता को भी तार-तार किया,

भाग्य का निर्णय जन्म से करके , निरपराध को कारावास दिया,

नैतिकता को ताक पे रख कर ,उत्पीडन को प्रथा का है नाम दिया,

और कर्म को रखकर अपने पीछे , खुद को प्रबल है इसने मान लिया,

हे मानव छोड़ स्वप्न भरी ये शय्या , उठकर सत्य की गुहार लगा,

और कर्म का विजयपताका, भू के मस्तक पर लहरा,

कर्म का डंका बजने से ही होगा जग का कल्याण,

फिर मानव कर्म से मानव होगा , नाम से न होगी उसकी पहचान...................

supriya.............

उड़ान


बादलो के परे देखा है एक आसमान,

और आसमान को छूने के लिए भरी है अब उडान,

जानती हू कठिन है मेरी मंजिल और राह भी आसन नहीं,

पर हार के रुकना मेरी भी तो पहचान नहीं ,

गिर के उठना सीख लिया है तो गिरने से अब मैं डरती नहीं,

और अँधेरा कितना भी गहरा हो उजाले की उम्मीद मरती नहीं,

कितनी भी विषम हो परिस्थितिया मैं मानूगी हार नहीं ,

क्योंकि घनघोर अँधेरे के बाद ही आती है फिर एक भोर नयी.............
supriya................

Mar 25, 2010

गरीब


कचरे में जन्मा एक जानवर बदनसीब हू मैं,

किसी भी चोट से जिसे दर्द होता नहीं ,हां वही , एक गरीब हू मैं,

न तो धूप लगती है, न ही तपती ज़मीन से पैर जलता है,

हमारे पेट को तो चार दिन का बासी खाना भी अमृत सा लगता है,

mercedes में बैठा बच्चा पलट के बार-बार मुझे देखता है,

क्या ये भी मेरी तरह इंसान है, बार-बार वो ये सोचता है,

पर मुझे तो है सिर्फ रोटी की चाहत, और इसी रोटी के लिए जिंदगी से जिंदगी भर लड़ता हू मैं,

और फिर इसी रोटी के लिए, जूते,चप्पल , हर चीज़ से हर रोज़ पिटता हू मैं,

ऊँची गद्दी पे बैठे लोग "गरीबी हटाओ" जैसी हर रोज़ कुछ नयी scheme बनाते है,

और इन scheme से वो और अमीर और हम और गरीब होते जाते है ,

अमीरों से थोडा अलग , हां थोडा अजीब हू मैं,

नफरत है दुनिया को जिससे, हां वही, वही गरीब हू मैं...............
supriya.............

जीवन







अथाह, असीमित , अपरिमेय मकाम है,



जीवन अविरलता का ही तो उपनाम है,



पथ में पुष्प है कभी, तो कभी शूल है,



कभी कपास सा है कोमल, तो कभी ये कुशाग्र त्रिशूल है,



क्षण- क्षण में है परिवर्तन, अस्थिरिता का ये पर्याय है,



भोर है कभी,कभी है संध्या, अनिश्चित्ता ही तो इसका कार्य है,



कभी दुविधा में डगमगाता हुआ कदम, कभी चट्टान सा अटल है ये,



कभी निर्मल निर्धन की कुटिया, तो कभी भव्य कठोर सा महल है ये,



माँ की थपकियो सा कभी, कभी पिता की फटकार सा,



कभी विजयश्री की खुशिया, तो कभी विषादी हार सा,



विविध रस,छंद,अलंकार भिन्न-भिन्न भाव है इसमें भरे,



समझ समझ के बस इतना ही समझा , जीवन है समझ से परे...........................



supriya..............

Mar 21, 2010

मेरी माँ


मेरी नीद ही सोती और मेरी नीद ही जगती है,

मैं रोऊ तो रोती वो और मेरी हँसी वो हँसती है,

मेरे बिन बोले ही समझ लेती है वो मेरी भूख प्यास,

क्या ये सच है की "माँ" में है ईश्वर का वास ?

जब से मैंने जन्म लिया , वो मुझे छोड़ कुछ सोचती नहीं,

मेरी खुशिया ही उसकी खुशिया, और कही ख़ुशी वो खोजती नहीं,

स्कूल से देर से लौटू तो, दरवाजे पे खड़ी मिलती है,

मेरी पांच मिनट की देरी और, उसकी चिंता आसमान को छूने लगती है,

मेरी हर चाहत,हर खाव्हिश हर कीमत पे पूरा करती है,

और मेरे कारण ही वो पापा से भी लड़ती है,

"माँ" के दिल में मैं बसी हू, और वो मुझमे ही जिया करती है,

आखिर मैंने जाना "माँ" में ईश्वर नहीं, हर ईश्वर में एक "माँ" बसती है...........

supriya.............

मेरी साख का एक फूल







मेरी साख का एक फूल जो टुटा तो मैं भी टूट गया था,



दुनिया और ईश्वर से तब मैं कितना रूठ गया था,



मेरा ही फूल क्यों टुटा, क्यों मेरा ही अपना छूटा,



क्यों दर्द दिया मुझको ही तूने, मैंने तेरा क्या था लूटा,



लड़ता था मैं ईश्वर से और यही मैं सोचा करता था,



कही नहीं उसका अस्तित्तव , दिन रात जिसे मैं पूजा करता था,



देखा फिर एक ऐसा मधुवन , जिसका हर फूल था मुरझाया,



जब जाना उसका दर्द तो मैं, अपने आप पे मुस्काया,



फिर भीड़ से गुजरा तो, हर सूरत में अपनी ही सूरत पायी,
और हर हसती सूरत के पीछे , खुशियों की टूटी-फूटी एक मूरत पायी............................
supriya...............

सुकून की तलाश


सोया हुआ सा ख्वाब है, जाने क्यों मन आज फिर उदास है,

जो मिल नहीं सकता कभी ,आज फिर उसीकी आस है,

हर कदम हर डगर बस मैं बढता ही गया,

हर अवरोध हर रूकावट पार मैं करता गया,

पहुच गया शिखर पे मैं , और सोचा सफल मैं हो गया,

पर दुनिया की दौड़ में शामिल, मैं असल में खो गया,

सब मिल गया है तो , क्यों जीवन में एक काश है,

और आज न जाने क्यों, फिर सुकून की तलाश है.............

supriya............

Mar 20, 2010

कल और आज


कल घर में एक ही TV था, रिमोट के लिए हम सब लड़ा करते थे,
cooler के सामने सोने के लिए, बिस्तर पे अडवांस बुकिंग किया करते थे,
अपनी chocolate खा के भाई की chocolate पे नज़र रखा करते थे,
मिलता जब उसकी chocolate का एक छोटा सा टुकड़ा तो विजय अनुभूति किया करते थे,
रात को चोरी चोरी हम पिक्चर देखा करते थे,
दरवाजे पे करते चौकीदारी ,पापा की हर आहट सुना करते थे ,
पहली रोटी माँ ने किसकी थाली में डाली, इस बात पे माँ से रोज़ लड़ा करते थे,
एक वो दिन भी था, जब हम हार में भी खुशिया ढूँढ लिया करते थे,
आज हर कमरे में टीवी है ,रिमोट के लिए कोई लड़ता नहीं,
chocolate भी अपनी अपनी है, chocolate में हिस्सा अब मिलता नहीं,
आहट सुनने की ख़वाहिश में ,अब सारी सारी रात करवटे बदलते है,
air conditioned रूम है फिर भी हम रात रात भर जगते है,
आज मेरी थाली में ही है पहली रोटी,पर भूख अब लगती नहीं,
कितने मुकाम हो गए है हासिल पर ख़ुशी कही मिलती नहीं.......................
supriya..........

Mar 18, 2010

बेटी

अम्मा कहती थी जब भाई का जन्म हुआ तो खुशिया अपार थी,
और जब जन्मी थी मैं,अम्मा को छोड़ हर चेहरे पे हार थी ,
किताबे बटी थी हमारी , स्कूल भी अलग अलग था,
मैं जाती थी पैदल भाई के लिए तांगा लगा था,
भाई को पढने के बाद खेलने का वक़्त दिया जाता था,
मुझे घर के काम से वक़्त निकाल कर पढने दिया जाता था,
मेरी रोटी में घी नहीं होता था क्योंकि भाई को घी ज्यादा भाता था,
शैतानी करने पे मैं बेहया और भाई नटखट कहलाता था,
अम्मा कहती सीख ले रिश्ते के दर्द को सहना,
बाबा भाई से कहते कभी किसी रिश्ते के आगे न झुकना,
दिन रात दहेज़ जोड़ते बाबा मुझको कोसा करते थे,
पर भाई को कॉलेज स्कूटर से भेजा करते थे,
अरमान था कॉलेज जाने का पढने का और कुछ बनने का,
पर भेजी गयी ससुराल मैं, और छपा फ़िर किस्सा दहेज़ के कारन एक लड़की के जलने का,
पड़े लिखे भाई की कीमत वसूली किसी और के पिता से ,
और इस काल चक्र को सीचा बार बार एक लड़की की चिता से,
दुनिया कहती है कोई भेद नहीं पर भेद वही करती है,
इसीलिए आज भी अजन्मे लड़की गर्भ में ही मरती है..........................
supriya.........................

Mar 16, 2010

खोज


मंदिर पे खोजा उसे और खोजा हर पत्थर पर,
कभी मस्जिद कभी चर्च और कभी गुरद्वारे पर,
भीड़ के साथ भीड़ में खोजा उसे हर तीर्थ स्थल पर,
पर्वतो पे चढकर कभी तो कभी मदीना के भूतल पर,
कभी गीता में कभी कुरान में खोजा उसे हर किताब में,
कभी व्रत में कभी उपवास में और कभी नमाज़ में,
खोजा हर जगह पर कभी न खोजा अपने आप में,
अलग समझता था जिसे वो हर पल था मेरे साथ में,
न मिला धरा पे न मिला गगन में,
खोज जब पूरी हुई तो मिला वो मेरे मन में...............
supriya.................

Mar 15, 2010

धर्म


हिन्दू बना कभी,कभी वो मुसलमान बना ,
धर्म के नाम पे ,न जाने कितनी बार वो हैवान बना,
मंदिर को तोड़ा कभी, मस्जिद पे कभी वार किया,
हर धर्म के सार पे अपने हथियारों से प्रहार किया,
मजहब के लिए लड़ते लड़ते रहा अब वो इंसान भी नहीं,
खून से लिखता है वो अपने धर्म अब उसका कोई ईमान भी नहीं,
मर गया वो सीख कर,जो किसी धर्म ने उसे न था सीखलाया,
और उसके मरने के बाद कुछ धर्मराजो ने हैवानियत को पहना त्याग का चोला लोगो को दिखलाया,
लोग फिर उठे है हिन्दू और मुसलमान बनने के लिए , धर्म का ढ़ोग करके अधर्म की राह पे चलने के लिए,
जो गलतिया इनसे हुई खुदा करे कोई और न कर सके,
धर्म पे लड़ने वाले लड़ने के पहले गीता कुरान पढ सके..................
supriya....................

थोड़ी सहमी थोड़ी डरी हू मैं


थोड़ी सहमी थोड़ी डरी हू मैं
यथार्थ के धरातल पर फिर अकेली खड़ी हू मैं
वृक्ष के साए में धूप से बचकर थी अब तक खड़ी
पर आज खुद ही वृक्ष बनने की है आई घड़ी
उत्तरदायित्तव से आज फिर घिरी हू मैं
थोड़ी सहमी थोड़ी डरी हू मैं.......................
मल्लाह के प्रतिनिधित्तव में नौका पे किया अब तक सफ़र ,
पर आज नौका लगानी है पार मुझे ही मल्लाह बनकर ,
लहरों पे डगमगाती नौका को लेकर आज फिर आगे बढी हू मैं,
थोड़ी सहमी थोड़ी डरी हू मैं....................
चिरागों की रौशनी में मैं अब तक प्रकाशित ही रही,
पर आज रौशनी के लिए खुद ही जलने की है आई घड़ी,
उजाले की चाह में अन्धकार से आज फिर लड़ी हू मैं,
थोड़ी सहमी थोड़ी डरी हू मैं.................
समय का चक्र है ये, ये चक्र चलता ही रहेगा,
मधुवन में कभी फूल तो कभी माली ये बनता रहेगा ,
पर मन चंचल है , तो कभी ये रूकेगा भी और डरेगा भी ,
पर "परिवर्तन संसार का नियम है "ये सोचकर ये चलेगा भी और बढेगा भी,
समय के इस फेर से आज पहली बार मिली हू मैं,
इसीलिए थोड़ी सी सहमी और थोड़ी सी डरी हू मैं.............
supriya.......................