Dec 5, 2010

एक वो कन्धा


एक वो कन्धा, जिस पर सिर रखते ही भूल जाती हू की कही कोई problem है life में, उदास होती हू तो वो कन्धा मेरी negative energy absorb कर लेता है, खुश होती हू तो उल्लास बढाता है,मेरा क्रोध मेरा बचपना सब कुछ सहता है, और कभी शिकायत नहीं करता की अब बस,थक गया है ये तेरा बोझ सहते सहते, अब और नहीं, नहीं शब्द उसके dictionary में ही नहीं है, कभी कभी मैं insomnia से पीड़ित हो जाती हू,पर वो कन्धा एक लोरी की तरह मुझे कब सुला जाता है मैं जान ही नहीं पाती, मेरा बोझ उठाने में उसे कभी तकलीफ नहीं होती, मेरी nonsense, stupid सी बातो का बोझ भी उसे intersting सा लगता है, मेरे mood के हिसाब से वो अपना posture बदलता है, मैं जब चिल्ला कर उस कंधे से सिर हटा लेती हो तो वो बुहत प्यार से मेरे सिर को फिर से सहारा देता है, वो कभी मुझसे कुछ नहीं मांगता, कभी कभी आश्चर्य होता की क्यों वो ऐसा क्यों है, उसका अपना कोई दुःख नहीं, सब कुछ बस मुझसे ही जुडा है, एक वो कंधा जिससे at present मैं दूर हू, बहुत याद आता है..

एक वो कन्धा मेरी "माँ" का

Nov 27, 2010

आग्रह


तुझको खोने का भय हर भय से बड़ा है,

मेरा कठोर, निर्दयी ह्रदय तेरे सामने हार कर खड़ा है,

आपदा कभी कोई डरा न सकी, पर तेरे आंसुओ से मैं डर गया,

जीने की ख्वाहिश है जिन्दा हो उठी, मन उल्लास से है भर गया,

रौद्र सी मेरी ये शख्सियत, बालक की भांति मचल उठी,

कटाक्ष सी तेरी वो दृष्टी, आत्मा को भेद कर गयी,

कल्पना मात्र से तेरी, वशीभूत होकर मैं खो गया,

स्वामी था आज तक अपने मन का, पर अब ये मन तेरा सेवक है हो गया,

जो कभी न झुका, कभी न हिला, वो अहम भी चूर चूर हुआ,

और ये स्वीकारने को मन आज पहली बार मजबूर हुआ,

मायने दें मेरे जीनव को स्वीकार कर, भावना ये समर्पण की,

देह की नहीं, लालसा है बस आत्मा से आत्मा के मिलन की..............

Oct 24, 2010

ब्राह्मण मैं कहलाता हू


उपनाम ही पहचान और, उपनाम ही आचरण है,



गुणवत्ता का तो कुछ पता नहीं, पर कुल कहता है हम ब्राह्मण है,



श्रेष्ठता का मुकुट शीर्ष पे, जनम का वरदान मिला,



संस्कृति में सर्वोत्तम होने का, शैशव से ही ज्ञान मिला,



निरामिष न रह सका कभी, फिर भी सात्त्विक मैं कहलाया हू,



मद-मदिरा का सेवक होकर भी, तामसिकता से अंकितक न हो पाया हू,



जग ने देखे मुझमे जो गुण , उनका मेरे मन में कोई स्थान नहीं,



और ब्राह्मण बने रहने के लिए मैंने किया कभी कोई योगदान नहीं,



व्यवहार को मेरे क्यों तुम , कुलनाम से आँका करते हो,



भूल तुम्हारी निर्णय नीति में, और मुझे दोषी ठहराया करते हो,



जो न जाना कभी किसी ने आज तुम्हे बतलाता हू,



ब्राह्मण का अर्थ न जानू मैं, फिर भी ब्राह्मण मैं कहलाता हू........




Oct 3, 2010

खुद से खुद की मुलाकात


भावनाए स्वाभिमान से लड़ती है बार-बार,
मोल किसका है जीवन में ज्यादा, विचारो में होती है तकरार,
क्यूं छोटा है इतना वजूद की, अहम हर कदम संभलता है,
मन के विकार को स्वीकार करने से, क्यूं इतना ये डरता है,
छवि के धूमिल होने का भय, एक भ्रमित छवि को जन्म देता है,
और जो मैं स्वयं नहीं, वो चरित्र मुझमे ही पनप लेता है,
असीमित गति से चलते मन पर नियंत्रण की कोशिश हो जाती है नाकाम,
मैं अगर सब में नहीं तो , क्यूं गूम हो जाती है पहचान,
भीड़ में रहने के लिए मैं बनी भीड़ बार-बार,
फिर खुद की खोज करने के लिए आत्मा ने की गुहार,
खोज की इस यात्रा का अंत मिला वही , जहा से की थी शुरुआत,
निष्कर्ष अंततः मिला यही की, सबसे कठिन है खुद से खुद की मुलाकात..............

Sep 23, 2010

राजधानी


बैलगाड़ी और रेलगाड़ी से होते हुए मैं पहुची राजधानी,


बड़ी सड़क और बड़ी ईमारत की सुनी थी कई कहानी,


सपनो में देखा करती थी, वो चौड़ी सड़के और मेट्रो की सवारी,


धक्का-मुक्की करके जब जॉब मिली दिल्ली में, तो ख़तम हुयी सारी लाचारी,


स्टेशन पे जब उतरी थी, तो किसी ने जबदस्ती मेरा सारा सामान खुद पे लाद लिया था ,


और मुझसे बिना पूछे पूरा बोरा बिस्तर एक ऑटो में डाल दिया था,


सुना था दिल्ली दिलवालों की, पर बिना मुद्रा दिल खुश होते ही नहीं,


शो ऑफ़ की इस नगरी में बिना मेकप लोग सोते भी नहीं,


डिब्बो से कमरों को लोग यहाँ घर कहा करते है,


यहाँ न जाने क्यूं सब पैसो की भाषा में ही बात किया करते है,


एक कमरा मिला मुझे , जिसे मैं घर नहीं कह पायी थी,


गड्ढे और ट्रैफिक से भरी सड़के , तो मेरे सपनो में भी नहीं आई थी,


सोने पे सुहागा तब हुआ, जब बारिश का मौसम आया था,


रोड रूपी नदी ने मुझे मेरे गाव का तालाब याद दिलाया था,


फर्क बस इतना था की, वो पानी निर्मल और उज्जवल था,


और यहाँ रोड पे हर दूसरी तरफ शिवर का ढक्कन खुला था,


बारिश से इतनी नफ़रत शायद पहले कभी नहीं थी,


सपनो में अब गाव की उची नीची मेड दिखा करती थी,


यहाँ के मच्छर भी गाव के मच्छर से ज्यादा बलवान थे,


मलेरिया जैसी बीमारी देना समझते शान के खिलाफ थे,


डेंगू , swine फ्लू बड़े शहर के बड़े थे रोग,


फायरिंग और बम ब्लास्ट न्यूज़ में डेली का डोज़ ,


गर्मी की प्रचंड धूप, और सर्दी का कोहरा दिल्ली में कुदरत का वरदान है ,


चोर-डकैती , क्राइम की दुनिया में दिल्ली हमेशा रखता अपना नाम है,


लाख कोशिश करती हू, पर नहीं है मिलती राह पुरानी,


सोच में उलझी बैठी हू की कब छूटेगी "राजधानी"........................


Sep 17, 2010

व्यस्तता ने मारा है मुझको


दौलत है पास है शोहरत है, पास केवल वक़्त नहीं,

वक़्त से हारा है ये दिल , वरना ये इतना भी सख्त नहीं,

समय जब खुद ही अपना नहीं, तो कैसे ये किसी और को दू,

व्यस्तता ने मारा है मुझको, वरना इच्छा तो मेरी भी है की सबकी मदद करू,

छुट्टी का केवल एक दिन जो खुद ही पूरा पड़ता नहीं,

जनसेवा तो करनी है, पर मैं समय से ज्यादा लड़ता नहीं,

जब छोटा था तब सोचा करता था, नहीं चलूँगा दुनिया की बनाई पटरी पे,

पर भीड़ में शामिल कब पता नहीं, घिर गया इस comman छतरी से,

कल एक हाथ उठा था आस में, की मैं भी हाथ बड़ाउंगा,

खून से लथपथ उस अधमरे शरीर का सहारा मैं बन पाऊंगा,

हाथ बढाना चाहा था मैंने, पर कल deadline थी प्रोजेक्ट की,

प्रोजेक्ट और इंसान में, obviously प्रोजेक्ट था ज्यादा कीमती,

सोचता रहता हू मैं दिनभर दुनिया को कैसे बदलना है,

रोज़ ये निर्णय लेता हू की बस अब ground लेवल पे जाके कुछ करना है,

पर ऑफिस और घर की जिम्मेदारी से मैं कैसे मुक्ति लू,

व्यस्तता ने मारा है मुझको, वरना इच्छा तो मेरी भी है की मैं सबकी मदद करू.......
सुप्रिया...........

Aug 6, 2010

21st century



Emotions बिकते है अब professionalism की ताक पर,

रिश्तो का है business, society के नाम पर,

commitment का रिश्तो से अब कोई नाता नहीं,

पिरो सके जो एक सूत्र में, ऐसा अब कोई धागा नहीं,

विश्वास की डोर हर रोज़ जुडती और टूटती है,

fantasy land को practical ये दुनिया आये दिन ही लूटती है,

प्यार की definition है अब, emotional अत्त्याचार,

आंसू और मुस्कुराहट, immaturity का है आहार,

जितने हो सके self centered उतने ही mature कहलायेंगे,

दर्द देखा जो किसी और का तो cool attitude कैसे पायेंगे,

I,me,and myself success की अब बस यही राह है,

position और power के रहते , रिश्तो की किसको चाह है,

इंसानियत इंसान से अलग थलग है पड़ी,

यारो इसी का नाम है 21st century ...........

सुप्रिया...........

Jul 18, 2010

मैं पतिता हू


नष्ट, भ्रष्ट, और पतित , न तो हू शोभनीय और न ही मर्यादित,

देह के इस संसार में मैं एक जलती चिता हू,

मनुष्य हू मैं बाद में पहले "मैं एक पतिता हू " ,

कभी कौड़ियो के मोल तो कभी अशर्फियों में मैं तौली गयी,

कभी दूसरो के हाथ तो कभी अपनों की नीलामी में मैं बोली गयी,

खरीद और बिक्री के इस व्यापार में , कभी सबसे सस्ती तो कभी सबसे महगी गयी,

आत्मा न देखी किसीने बस त्वचा की उज्जव्ल्लता से मैं परखी गयी,

परदे की आड़ में , बेपर्दा हुयी मैं बार बार,

दोष देकर मुझे , इज्जत से बैठे है धर्म के ठेकेदार,

दुनिया की हर त्रुटी आकर मुझमे है समां जाती,

भाव में बहती और नैतिकता में ठहर सी जाती,

गंगा हू मैं भी लेकिन मैं सजीव हू,

इसीलिए चरित्रवानो के लोक में मैं थोड़ी सी अजीब हू,

मानवता का पाठ सीखाने वाले , धर्म की गुहार लगाने वाले,

मेरे दर पे धर्म निरपेक्ष होकर, मिलाते है प्याले से प्याले,

हर वर्ग , हर श्रेणी , हर भेद में बहती मैं एक सरिता हू,

मनुष्य हू मैं बाद में , पहले "मैं एक पतिता हू"...........

सुप्रिया....

May 21, 2010

दौड़ भाग के जीवन में


दौड़ भाग के जीवन में , कभी तो ठहराव लाओ,

कभी तो छूटे कोई ट्रेन, कभी तो बचपन को दुहराओ,

दौड़ भाग के जीवन में कभी तो ठहराव लाओ.......

सुबह की चाय का प्याला, और सूरज का आँगन में आना,

आँख मूँद कर सपनो की दुनिया में फिर खो जाना,

चिडियों की चहचहाहट को, कभी तो फिर से तुम गाओ,

दौड़ भाग के जीवन में , कभी तो ठहराव लाओ......

बारिश की गीली मिट्टी की खुशबू का साँसों में बस जाना,

टूटे फूटे से रेत के घर पे बार-बार इतराना,

भूल के सारी जिम्मेदारी , कभी तो फिर से बेवजह तुम मुस्काओ,

दौड़ भाग के जीवन में, कभी तो ठहराव लाओ........

कागज की नाव की रेस लगाना, कटी पतंगों को चुराना,

छोटी-छोटी सी बातो पे, हर बड़ी बात को बिसराना,

नज़र छुपाते बचते-बचते , कभी तो फिर से कोई गलती तुम कर जाओ,

दौड़ भाग के जीवन में, कभी तो ठहराव लाओ........

क्लास बंक करके पिक्चर जाना, पकडे जाने पे तैयार बहाना,

चिल्लर पैसे जोड़कर , restaurant में खाना खाना,

भूल के अपना सारा ego, कभी तो फिर से कोई बाज़ी तुम हार जाओ,

दौड़ भाग के जीवन में कभी तो ठहराव लाओ.........

बीत गया तो नहीं मिलेगा , समय का पहिया चलता ही रहेगा,

कल की सोच में उलझे-उलझे, सुलझे आज को मत ठुकराओ,

दौड़ भाग के जीवन में , कभी तो ठहराव लाओ...............
supriya...................





May 16, 2010

चित्त की व्यथा


रात बीत गयी ये सोचते हुए की रात भर हम क्यों न सो सके,

बेवजह क्यों है इतनी वजह की हम वजह ही न खोज सके,

दूर से दीखता है सब कुछ, पास आने पे सब है मरीचिका,

कभी पानी की प्यास , तो कभी कस्तूरी की तृष्ना,

संतो के साथ किया सत्संग , और कपटी के भी विचार जाने,

दूसरो में खोज रहे है हम जिंदगी के मायने,

पता नहीं किस चीज की तलाश है, क्या है मेरी मंजिल और जाना किस राह है,

जो मिल गया वो नहीं था चाहिए, और चाहत से हम खुद ही अन्जान है,

जीवन का मकसद खो सा गया है, खोज भी अधूरी सी आज है,

स्वप्न है ये जिंदगी या वास्तविकता का झूठा ये जाल है,

कहाँ से की आरम्भ और कहाँ है अंत यात्रा का लक्ष्य भ्रम का ही तो मार्ग है,

चित्त की व्यथा का वर्णन लेखनी के सक्षमता से परे आज है................

supriya...............

Apr 24, 2010

मेरा भाई


This poem is for my brother "Rajat"


लड़ना, झगड़ना और अकड़ना बस यही था एक रिश्ता प्यारा,

कभी लूडो तो कभी विडिओ गेम बनता युद्ध क्षेत्र हमारा,

वो बाल खीचता मेरे, मैं पैर से मारा करती थी,

लड़ती भी थी उसीके साथ, साथ उसीके हँसती थी,

हारने लगती जब मैं पापा से शिकायत करती थी,

पड़ती थी जब उसको मार साथ में मैं भी रोया करती थी,

माँ जो करती उसका ज्यादा लाड कितना मैं चिढा करती थी,

उसकी जितनी height पाने के लिए दरवाजे से लटका करती थी,

मैं उसके साथ क्रिकेट , वो मेरे साथ घर-घर खेला करता था,

कभी भाई तो कभी उसमे दोस्त मिला करता था,

आज भी बचपन मेरा उसके आगे जी उठता है,

इस मतलब की दुनिया में , निस्वार्थ प्यार ही उससे मिलता है,

चपत मरता है कभी, कभी है पोछे आंसू उसका हाथ,

पास मेरे एक ऐसा रिश्ता जो नहीं है बदला वक़्त के साथ...............

supriya.........

Apr 10, 2010

औरत


एक सपना देखा है अब हमने इन आँखों में,

उड़ेंगे ऊँचा आकाश की बाहों में ,

नहीं जियेंगे किसी सहारे, बन जायेंगे हम खुद ही सहारा,

नहीं चाहिए कोई नाविक, खुद ढूँढेंगे हम अपना किनारा,

देना सीखेंगे उनको, जिन्होंने देना सीखलाया,

नहीं चुनेंगे अब वो मार्ग,जो परिपाटी ने दिखलाया,

अब इन सपनो को हम हकीकत का नाम देंगे,

इस दुनिया में औरत को सिर्फ उसी की पहचान देंगे,

अब न होगी कोई अग्नि परीक्षा, और नहीं चाहिए अब वो राम,

जिसने अपनी ही सीता को भेज दिया वनवास,

अपने नाम के आगे किसी और नाम की नहीं करेंगे तलाश,

खुद ही चुनेंगे अपनी धरा, और अपनी ही शर्तो पे जीतेंगे अपना आकाश......................

supriya.................


कभी मोह का बंधन, कभी माया का जाल


भू लोक के बवंडर में फसता ही गया मैं,

सुलझने की कोशिश में उलझता ही गया मैं,

कभी बैठा नहीं सोचा नहीं मशीन बनकर मैं जीता रहा,

मदिरा को समझ गंगाजल हर घूँट मैं पीता रहा,

कभी मोह का था बंधन, कभी माया का जाल था,

सोने के पिंजरे में कैद पंछी सा मेरा हाल था,

स्वप्न से कभी जागा नहीं, नीद में उम्र भर चलता रहा,

भंवर को समझ किनारा ,नौका की सवारी मैं करता रहा,

पिंजरे को समझा आकाश, और मेरी हर उड़ान पिजरे में ही सीमित हुई,

जब छूटने लगी काया, चेतना भी तभी जीवित हुई,

भौतिकता को समझ आनंद का बीज , जीवन पर्यंत ये बीज मैं बोता गया,

और कुछ पाने की चाह में , न जाने क्या-क्या मैं खोता गया......................

supriya.....................

Apr 3, 2010

कविता


कविता का क्या अर्थ है , ये आकर मुझे समझा दे कोई,

मुझ नासमझ को कविता लिखना सीखा दे कोई,

"क" किसके लिए,"व्" का क्या मतलब है,

"त" का अर्थ न समझू मैं,ये मेरे लिए सिर्फ अक्षर है,

"क" से कागज, "व्" से विज्ञ ,क्या "त" से ताल होता है,

कागज़ पे विज्ञ का ताल से लिखना क्या कविता होता है,

नहीं-नहीं "क" से कोमल, "व्" से वाणी, "त" से तराना होता है,

कोमल वाणी तराना लिखे यही तो कविता होता है,

मैं मूर्ख ये भी न जानू , कविता होता है की होती है,

क्या "क" से कलम , "व्" से वक़्त , "त" से तन्हाई होती है,

क्या कविता क्या इसका भाव क्या भावार्थ होता है,

मैं तो समझू कविता के तीन अक्षर में सारा ब्रम्हांड सोता है...................

supriya...............

Mar 28, 2010

मोहब्बत


मैं भी कभी हँसा करती थी, किसी से हक़ से लड़ा करती थी,

सपनो की दुनिया से मैं भी कभी जुड़ा करती थी,

लौट आता था सारा बचपन , जब वो डाट कर समझाया करता था,

और फिर गोद में अपने सर रखकर, लाड जताया करता था,

मिट जाती सारी तकलीफे, जब उसकी बाहों में सिमटती थी,

तब दुनिया की सारी खुशिया, मेरे दामन में ही तो बसती थी,

पर झूठा था उसका सारा प्यार, झूठा था सपनो का वो संसार,

झूठे थे उसके सारे वादे, झूठा था उसका हर इकरार,

पर आज भी सच मान उन्हें,इन्तजार किया करती हू,

और आज भी, मैं सिर्फ उन्ही सपनो से प्यार किया करती हू,

जानती हू कुछ नहीं मिलेगा, फिर भी दुआ में उसे ही माँगा करती हू,

अब कभी लडती है किस्मत मुझसे, और कभी मैं किस्मत से लड़ा करती हू,

गम बस इतना है की, उसके आने की आस मरने भी नहीं देती है,

और दर्द के इस मंजर को दुनिया ""मोहब्बत"" कहती है........................

supriya............

Mar 26, 2010

धर्म या कर्म




धर्म ने बाटा जनमत को,भेद धर्म ने सीखलाया,

जाती-पाती में बाट के मानव को, बैर है मन में उपजाया,

नफरत के काटे बोये है,मानवता को भी तार-तार किया,

भाग्य का निर्णय जन्म से करके , निरपराध को कारावास दिया,

नैतिकता को ताक पे रख कर ,उत्पीडन को प्रथा का है नाम दिया,

और कर्म को रखकर अपने पीछे , खुद को प्रबल है इसने मान लिया,

हे मानव छोड़ स्वप्न भरी ये शय्या , उठकर सत्य की गुहार लगा,

और कर्म का विजयपताका, भू के मस्तक पर लहरा,

कर्म का डंका बजने से ही होगा जग का कल्याण,

फिर मानव कर्म से मानव होगा , नाम से न होगी उसकी पहचान...................

supriya.............

उड़ान


बादलो के परे देखा है एक आसमान,

और आसमान को छूने के लिए भरी है अब उडान,

जानती हू कठिन है मेरी मंजिल और राह भी आसन नहीं,

पर हार के रुकना मेरी भी तो पहचान नहीं ,

गिर के उठना सीख लिया है तो गिरने से अब मैं डरती नहीं,

और अँधेरा कितना भी गहरा हो उजाले की उम्मीद मरती नहीं,

कितनी भी विषम हो परिस्थितिया मैं मानूगी हार नहीं ,

क्योंकि घनघोर अँधेरे के बाद ही आती है फिर एक भोर नयी.............
supriya................

Mar 25, 2010

गरीब


कचरे में जन्मा एक जानवर बदनसीब हू मैं,

किसी भी चोट से जिसे दर्द होता नहीं ,हां वही , एक गरीब हू मैं,

न तो धूप लगती है, न ही तपती ज़मीन से पैर जलता है,

हमारे पेट को तो चार दिन का बासी खाना भी अमृत सा लगता है,

mercedes में बैठा बच्चा पलट के बार-बार मुझे देखता है,

क्या ये भी मेरी तरह इंसान है, बार-बार वो ये सोचता है,

पर मुझे तो है सिर्फ रोटी की चाहत, और इसी रोटी के लिए जिंदगी से जिंदगी भर लड़ता हू मैं,

और फिर इसी रोटी के लिए, जूते,चप्पल , हर चीज़ से हर रोज़ पिटता हू मैं,

ऊँची गद्दी पे बैठे लोग "गरीबी हटाओ" जैसी हर रोज़ कुछ नयी scheme बनाते है,

और इन scheme से वो और अमीर और हम और गरीब होते जाते है ,

अमीरों से थोडा अलग , हां थोडा अजीब हू मैं,

नफरत है दुनिया को जिससे, हां वही, वही गरीब हू मैं...............
supriya.............

जीवन







अथाह, असीमित , अपरिमेय मकाम है,



जीवन अविरलता का ही तो उपनाम है,



पथ में पुष्प है कभी, तो कभी शूल है,



कभी कपास सा है कोमल, तो कभी ये कुशाग्र त्रिशूल है,



क्षण- क्षण में है परिवर्तन, अस्थिरिता का ये पर्याय है,



भोर है कभी,कभी है संध्या, अनिश्चित्ता ही तो इसका कार्य है,



कभी दुविधा में डगमगाता हुआ कदम, कभी चट्टान सा अटल है ये,



कभी निर्मल निर्धन की कुटिया, तो कभी भव्य कठोर सा महल है ये,



माँ की थपकियो सा कभी, कभी पिता की फटकार सा,



कभी विजयश्री की खुशिया, तो कभी विषादी हार सा,



विविध रस,छंद,अलंकार भिन्न-भिन्न भाव है इसमें भरे,



समझ समझ के बस इतना ही समझा , जीवन है समझ से परे...........................



supriya..............

Mar 21, 2010

मेरी माँ


मेरी नीद ही सोती और मेरी नीद ही जगती है,

मैं रोऊ तो रोती वो और मेरी हँसी वो हँसती है,

मेरे बिन बोले ही समझ लेती है वो मेरी भूख प्यास,

क्या ये सच है की "माँ" में है ईश्वर का वास ?

जब से मैंने जन्म लिया , वो मुझे छोड़ कुछ सोचती नहीं,

मेरी खुशिया ही उसकी खुशिया, और कही ख़ुशी वो खोजती नहीं,

स्कूल से देर से लौटू तो, दरवाजे पे खड़ी मिलती है,

मेरी पांच मिनट की देरी और, उसकी चिंता आसमान को छूने लगती है,

मेरी हर चाहत,हर खाव्हिश हर कीमत पे पूरा करती है,

और मेरे कारण ही वो पापा से भी लड़ती है,

"माँ" के दिल में मैं बसी हू, और वो मुझमे ही जिया करती है,

आखिर मैंने जाना "माँ" में ईश्वर नहीं, हर ईश्वर में एक "माँ" बसती है...........

supriya.............

मेरी साख का एक फूल







मेरी साख का एक फूल जो टुटा तो मैं भी टूट गया था,



दुनिया और ईश्वर से तब मैं कितना रूठ गया था,



मेरा ही फूल क्यों टुटा, क्यों मेरा ही अपना छूटा,



क्यों दर्द दिया मुझको ही तूने, मैंने तेरा क्या था लूटा,



लड़ता था मैं ईश्वर से और यही मैं सोचा करता था,



कही नहीं उसका अस्तित्तव , दिन रात जिसे मैं पूजा करता था,



देखा फिर एक ऐसा मधुवन , जिसका हर फूल था मुरझाया,



जब जाना उसका दर्द तो मैं, अपने आप पे मुस्काया,



फिर भीड़ से गुजरा तो, हर सूरत में अपनी ही सूरत पायी,
और हर हसती सूरत के पीछे , खुशियों की टूटी-फूटी एक मूरत पायी............................
supriya...............

सुकून की तलाश


सोया हुआ सा ख्वाब है, जाने क्यों मन आज फिर उदास है,

जो मिल नहीं सकता कभी ,आज फिर उसीकी आस है,

हर कदम हर डगर बस मैं बढता ही गया,

हर अवरोध हर रूकावट पार मैं करता गया,

पहुच गया शिखर पे मैं , और सोचा सफल मैं हो गया,

पर दुनिया की दौड़ में शामिल, मैं असल में खो गया,

सब मिल गया है तो , क्यों जीवन में एक काश है,

और आज न जाने क्यों, फिर सुकून की तलाश है.............

supriya............

Mar 20, 2010

कल और आज


कल घर में एक ही TV था, रिमोट के लिए हम सब लड़ा करते थे,
cooler के सामने सोने के लिए, बिस्तर पे अडवांस बुकिंग किया करते थे,
अपनी chocolate खा के भाई की chocolate पे नज़र रखा करते थे,
मिलता जब उसकी chocolate का एक छोटा सा टुकड़ा तो विजय अनुभूति किया करते थे,
रात को चोरी चोरी हम पिक्चर देखा करते थे,
दरवाजे पे करते चौकीदारी ,पापा की हर आहट सुना करते थे ,
पहली रोटी माँ ने किसकी थाली में डाली, इस बात पे माँ से रोज़ लड़ा करते थे,
एक वो दिन भी था, जब हम हार में भी खुशिया ढूँढ लिया करते थे,
आज हर कमरे में टीवी है ,रिमोट के लिए कोई लड़ता नहीं,
chocolate भी अपनी अपनी है, chocolate में हिस्सा अब मिलता नहीं,
आहट सुनने की ख़वाहिश में ,अब सारी सारी रात करवटे बदलते है,
air conditioned रूम है फिर भी हम रात रात भर जगते है,
आज मेरी थाली में ही है पहली रोटी,पर भूख अब लगती नहीं,
कितने मुकाम हो गए है हासिल पर ख़ुशी कही मिलती नहीं.......................
supriya..........

Mar 18, 2010

बेटी

अम्मा कहती थी जब भाई का जन्म हुआ तो खुशिया अपार थी,
और जब जन्मी थी मैं,अम्मा को छोड़ हर चेहरे पे हार थी ,
किताबे बटी थी हमारी , स्कूल भी अलग अलग था,
मैं जाती थी पैदल भाई के लिए तांगा लगा था,
भाई को पढने के बाद खेलने का वक़्त दिया जाता था,
मुझे घर के काम से वक़्त निकाल कर पढने दिया जाता था,
मेरी रोटी में घी नहीं होता था क्योंकि भाई को घी ज्यादा भाता था,
शैतानी करने पे मैं बेहया और भाई नटखट कहलाता था,
अम्मा कहती सीख ले रिश्ते के दर्द को सहना,
बाबा भाई से कहते कभी किसी रिश्ते के आगे न झुकना,
दिन रात दहेज़ जोड़ते बाबा मुझको कोसा करते थे,
पर भाई को कॉलेज स्कूटर से भेजा करते थे,
अरमान था कॉलेज जाने का पढने का और कुछ बनने का,
पर भेजी गयी ससुराल मैं, और छपा फ़िर किस्सा दहेज़ के कारन एक लड़की के जलने का,
पड़े लिखे भाई की कीमत वसूली किसी और के पिता से ,
और इस काल चक्र को सीचा बार बार एक लड़की की चिता से,
दुनिया कहती है कोई भेद नहीं पर भेद वही करती है,
इसीलिए आज भी अजन्मे लड़की गर्भ में ही मरती है..........................
supriya.........................

Mar 16, 2010

खोज


मंदिर पे खोजा उसे और खोजा हर पत्थर पर,
कभी मस्जिद कभी चर्च और कभी गुरद्वारे पर,
भीड़ के साथ भीड़ में खोजा उसे हर तीर्थ स्थल पर,
पर्वतो पे चढकर कभी तो कभी मदीना के भूतल पर,
कभी गीता में कभी कुरान में खोजा उसे हर किताब में,
कभी व्रत में कभी उपवास में और कभी नमाज़ में,
खोजा हर जगह पर कभी न खोजा अपने आप में,
अलग समझता था जिसे वो हर पल था मेरे साथ में,
न मिला धरा पे न मिला गगन में,
खोज जब पूरी हुई तो मिला वो मेरे मन में...............
supriya.................

Mar 15, 2010

धर्म


हिन्दू बना कभी,कभी वो मुसलमान बना ,
धर्म के नाम पे ,न जाने कितनी बार वो हैवान बना,
मंदिर को तोड़ा कभी, मस्जिद पे कभी वार किया,
हर धर्म के सार पे अपने हथियारों से प्रहार किया,
मजहब के लिए लड़ते लड़ते रहा अब वो इंसान भी नहीं,
खून से लिखता है वो अपने धर्म अब उसका कोई ईमान भी नहीं,
मर गया वो सीख कर,जो किसी धर्म ने उसे न था सीखलाया,
और उसके मरने के बाद कुछ धर्मराजो ने हैवानियत को पहना त्याग का चोला लोगो को दिखलाया,
लोग फिर उठे है हिन्दू और मुसलमान बनने के लिए , धर्म का ढ़ोग करके अधर्म की राह पे चलने के लिए,
जो गलतिया इनसे हुई खुदा करे कोई और न कर सके,
धर्म पे लड़ने वाले लड़ने के पहले गीता कुरान पढ सके..................
supriya....................

थोड़ी सहमी थोड़ी डरी हू मैं


थोड़ी सहमी थोड़ी डरी हू मैं
यथार्थ के धरातल पर फिर अकेली खड़ी हू मैं
वृक्ष के साए में धूप से बचकर थी अब तक खड़ी
पर आज खुद ही वृक्ष बनने की है आई घड़ी
उत्तरदायित्तव से आज फिर घिरी हू मैं
थोड़ी सहमी थोड़ी डरी हू मैं.......................
मल्लाह के प्रतिनिधित्तव में नौका पे किया अब तक सफ़र ,
पर आज नौका लगानी है पार मुझे ही मल्लाह बनकर ,
लहरों पे डगमगाती नौका को लेकर आज फिर आगे बढी हू मैं,
थोड़ी सहमी थोड़ी डरी हू मैं....................
चिरागों की रौशनी में मैं अब तक प्रकाशित ही रही,
पर आज रौशनी के लिए खुद ही जलने की है आई घड़ी,
उजाले की चाह में अन्धकार से आज फिर लड़ी हू मैं,
थोड़ी सहमी थोड़ी डरी हू मैं.................
समय का चक्र है ये, ये चक्र चलता ही रहेगा,
मधुवन में कभी फूल तो कभी माली ये बनता रहेगा ,
पर मन चंचल है , तो कभी ये रूकेगा भी और डरेगा भी ,
पर "परिवर्तन संसार का नियम है "ये सोचकर ये चलेगा भी और बढेगा भी,
समय के इस फेर से आज पहली बार मिली हू मैं,
इसीलिए थोड़ी सी सहमी और थोड़ी सी डरी हू मैं.............
supriya.......................