Apr 24, 2018

कहाँ जा रही, कब आएगी


कहाँ जा रही, कब आएगी , मुझसे ही पूंछा बस हर बार,

रात में घर से बाहर जाना,जैसे जान पे लटकी हो तलवार,

कौन है साथ में तेरे, विस्तृत विवरण का आवेदन लगता है,

और जब तक घर लौट न आऊ , माँ बाबा का बस जागरण ही चलता है,

काश की पूछा होता बेटे से भी, कहाँ जा रहा,कब आएगा, 
तो मेरे लिए फिक्र थोड़ी कम हो जाती,

और मेरी स्कर्ट पे आलोचना करने वालो की जुबाँ भी शायद बंद हो जाती,

तेरे लिए शॉर्ट्स सहजता,  और  मेरे लिए बन जाता अंग प्रदर्शन है,

रूढ़िवादी इस दुनिया में पीड़ित पर ही सारे बंधन है,

घर की इज्जत आज भी बेटी , और उसी के कंधो पे मर्यादा का सारा बोझ,

१७वी सदी हो या २१वी  , नहीं है बदली लोगो की सोच,

नहीं है बदली लोगो की सोच. 


Mar 14, 2018

दो घूँट जाम दे दो ......

छीनकर समझदारी मेरी, थोड़ा सा लड़कपन उधार दे दो,

बहुत हो गया है  गंगाजल, अब बस एक प्याले में दो घूँट जाम दे दो,

ये होशो- हवास छीनकर,थोड़ी सी रूमानियत का अहसास दे दो,

बहुत जी लिया बनावट की दीवार में, अब तो बस एक बेपर्दा मकान दे दो,

बहुत हो गया है गंगाजल, अब बस दो घूँट जाम दे दो,

यश, प्रतिष्ठा, और छीन के ये मान भी, पारदर्शिता का तुम मुझे उपहार दे दो,

बंधनो में बंध चुकी  हूँ बहुत ,अब बस थोड़ा सा जीने का अधिकार दे दो,

बहुत हो गया है गंगाजल, अब बस दो घूँट जाम दे दो,

जमीं , ज़ागीर  और छीन के ये यथार्थ भी,विमोह का फिर से थोड़ा सा मायाजाल दे दो,

रम लिया बहुत इस भौतिक जग में, अब तो बस कल्पना का एक संसार दे दो,

सच में बहुत हो गया है गंगाजल, अब बस एक प्याले में दो घूँट जाम दे दो,

दो घूँट जाम दे दो. .  . .