Mar 14, 2018

दो घूँट जाम दे दो ......

छीनकर समझदारी मेरी, थोड़ा सा लड़कपन उधार दे दो,

बहुत हो गया है  गंगाजल, अब बस एक प्याले में दो घूँट जाम दे दो,

ये होशो- हवास छीनकर,थोड़ी सी रूमानियत का अहसास दे दो,

बहुत जी लिया बनावट की दीवार में, अब तो बस एक बेपर्दा मकान दे दो,

बहुत हो गया है गंगाजल, अब बस दो घूँट जाम दे दो,

यश, प्रतिष्ठा, और छीन के ये मान भी, पारदर्शिता का तुम मुझे उपहार दे दो,

बंधनो में बंध चुकी  हूँ बहुत ,अब बस थोड़ा सा जीने का अधिकार दे दो,

बहुत हो गया है गंगाजल, अब बस दो घूँट जाम दे दो,

जमीं , ज़ागीर  और छीन के ये यथार्थ भी,विमोह का फिर से थोड़ा सा मायाजाल दे दो,

रम लिया बहुत इस भौतिक जग में, अब तो बस कल्पना का एक संसार दे दो,

सच में बहुत हो गया है गंगाजल, अब बस एक प्याले में दो घूँट जाम दे दो,

दो घूँट जाम दे दो. .  . . 


Jul 19, 2017

कितने ख़ास हो तुम

मेरा एक छोटा सा कोना, आंसू ख़ुशी के हो या गम के उस कोने में ही बहते थे, मेरा बस वही कोना हो तुम,

मुस्कुराहट  के साथ जो नमी थी  आँखों में, मेरा वही हसना और बस वही रोना हो तुम,

अधिकार समझती थी जिसपे, मेरे बचपन के घर का  वो आँगन हो तुम,

कितनी भी मैली , कितनी भी गन्दी, फिर भी जो समेट ले खुद में मुझको,  मेरी  माँ का वो दामन हो तुम,

यकीन था जिस टूटते हुए तारे पे, उस खवाहिश की पहचान  हो  तुम ,

 कैसे इन सब लम्हो से फिर भी अनजान हो तुम,

सुकून देती थी जो सबसे ज्यादा  मेरी वो किताब हो तुम,

बंद तालो में  अनसुलझे  पड़े सवालो   का जवाब हो तुम,

देता है जो खुद से प्यार करने का जज्बा , मेरा वो विश्वास हो तुम,

हर बीते ख़ुशी के लम्हो सा एक अहसास हो तुम,

तुम ही कह दो की मैं शब्दों में  कैसे कह दू की  मेरे लिए "कितने ख़ास हो तुम".