May 23, 2018

दोजख़ में भी भूख़ क्यों जाती नहीं



                                       

मज़हब , तख़्त , पैसा, ये बातें कुछ समझ में आती नहीं,

रोटी मिलेगी क्या अम्मी, दोजख़ में भी भूख़ क्यों जाती नहीं,

अपनी मर्जी की कब्र कब मिलेगी मुझे, तेरे झूठे कफ़न में जान भी निकल पाती नहीं,

दोजख़ में भी भूख क्यों जाती नहीं,

मुस्तक़बिल मेरा मुझे कब मिलेगा लिखने, दूसरो की कलम अब मुझे भाँती नहीं,

दोजख़ में भी भूख क्यों जाती नहीं,

जो मरा वो भी मेरा था,जिसने मारा वो भी मेरा था, अपनों से अपनों की जंग ख़त्म क्यों हो पाती नहीं ,

दोजख़ में भी भूख क्यों जाती नहीं,

हथियार नहीं अब थमा किताब तू हाथ में, मेरी रूह तेरी बगावत से मेल खाती नहीं,

दोजख़ में भी भूख क्यों जाती नहीं,

मेरा मुंसिफ ही बन गया है, दुश्मन मेरा, इन्साफ की गुहार दूर तक पहुंच पाती नहीं,

दोजख में भी भूख क्यों जाती नहीं,

न बनना है काफ़िर , न बनना है मसीहा, इंसान बस रहने दे मुझे,

ये बात तेरे जहन  में क्यों आती नहीं,

दोजख़  में भी भूख क्यों जाती नहीं,

दे दे मुझे थोड़ा सा अमन, देखती हू दूर तक पर सुक़ून की जमीं कही भी दिख पाती नहीं,

अम्मी बस इतना बता दे की दोजख में भी भूख क्यों जाती नहीं,

भूख क्यों जाती नहीं। 











Apr 24, 2018

कहाँ जा रही, कब आएगी


कहाँ जा रही, कब आएगी , मुझसे ही पूंछा बस हर बार,

रात में घर से बाहर जाना,जैसे जान पे लटकी हो तलवार,

कौन है साथ में तेरे, विस्तृत विवरण का आवेदन लगता है,

और जब तक घर लौट न आऊ , माँ बाबा का बस जागरण ही चलता है,

काश की पूछा होता बेटे से भी, कहाँ जा रहा,कब आएगा, 
तो मेरे लिए फिक्र थोड़ी कम हो जाती,

और मेरी स्कर्ट पे आलोचना करने वालो की जुबाँ भी शायद बंद हो जाती,

तेरे लिए शॉर्ट्स सहजता,  और  मेरे लिए बन जाता अंग प्रदर्शन है,

रूढ़िवादी इस दुनिया में पीड़ित पर ही सारे बंधन है,

घर की इज्जत आज भी बेटी , और उसी के कंधो पे मर्यादा का सारा बोझ,

१७वी सदी हो या २१वी  , नहीं है बदली लोगो की सोच,

नहीं है बदली लोगो की सोच.